कॉलेज का पहला दिन हमेशा शोर से भरा होता है।
कहीं हंसी, कहीं नए दोस्त, कहीं दिखावा… और कहीं ऐसी मुलाकातें जो जिंदगी बदल देती हैं।
लेकिन आरव की जिंदगी बदलने वाली मुलाकात की शुरुआत… नफरत से हुई थी।
बारिश अभी-अभी रुकी थी।
कॉलेज के बड़े गेट के बाहर कीचड़ और पानी जमा था।
स्टूडेंट्स जल्दी-जल्दी अंदर जा रहे थे।
आरव बाइक से उतरा।
ब्लैक हुडी, ठंडी आंखें, और चेहरे पर वही “मुझे किसी से मतलब नहीं” वाला भाव।
उसने हेलमेट उतारा और सीधे कैंपस की तरफ बढ़ गया।
तभी—
“देख के चल नहीं सकते क्या?!”
एक तेज आवाज उसके पीछे गूंजी।
आरव ने मुड़कर देखा।
सफेद कुर्ती में खड़ी एक लड़की अपने कपड़ों पर लगे कीचड़ को साफ कर रही थी।
उसकी आंखों में गुस्सा था… ऐसा गुस्सा जो सामने वाले को छोटा महसूस करा दे।
“तुम्हारी बाइक से पूरा पानी उछल गया!” उसने तीखे अंदाज़ में कहा।
आरव ने एक नजर देखा… फिर बिना माफी मांगे बोला—
“सड़क है। होता है।”
लड़की कुछ सेकंड उसे घूरती रही।
“वाह… attitude तो ऐसा है जैसे कॉलेज तुम्हारे बाप का हो।”
आरव हल्का सा मुस्कुराया।
“और तुम ऐसे react कर रही हो जैसे कपड़ों पर acid गिर गया।”
“Excuse me?!”
“जो सुना वही।”
उसके चेहरे पर साफ चिढ़ दिखाई दे रही थी।
“नाम क्या है तुम्हारा?”
“क्यों?”
“ताकि याद रख सकूं किस बेवकूफ से दिन खराब हुआ।”
आरव उसके करीब आया।
“आरव।”
फिर बिना रुके आगे बढ़ गया।
लड़की बस उसे जाते हुए देखती रह गई।
उसने धीरे से दांत भींचे।
“घमंडी इंसान…”
क्लासरूम में कुछ देर बाद—
“Guys, meet your new classmate… निशा।”
वही लड़की दरवाजे से अंदर आई।
और उसकी नजर सीधे आरव पर जाकर रुकी।
आरव भी उसे देखकर हल्का सा हंसा।
निशा के मन में बस एक ही बात आई—
“हे भगवान… यही लड़का मेरी क्लास में क्यों?”
टीचर ने कहा—
“निशा, तुम पीछे वाली सीट पर बैठ जाओ।”
पीछे सिर्फ एक सीट खाली थी।
आरव के बगल वाली।
पूरी क्लास हल्का हंसने लगी।
निशा धीरे-धीरे वहां जाकर बैठी।
बैठते ही उसने कुर्सी थोड़ा दूर खिसका ली।
आरव ने देखा और धीमे से बोला—
“इतनी नफरत?”
निशा बिना उसकी तरफ देखे बोली—
“तुम जैसे लोगों से जितनी दूर रहो उतना अच्छा है।”
“Interesting…”
“क्या?”
“पहले दिन ही judge कर लिया।”
निशा अब उसकी तरफ मुड़ी।
“कुछ लोग पहली नजर में ही समझ आ जाते हैं।”
आरव ने मुस्कुराकर सिर झुका लिया।
लेकिन उसकी आंखों में हल्की चुभन थी… जो शायद किसी ने नोटिस नहीं की।
लंच ब्रेक।
कॉलेज कैंटीन पूरी भरी हुई थी।
निशा अपनी दोस्त सिया के साथ बैठी थी।
“यार वो आरव बहुत rude है,” निशा ने झुंझलाकर कहा।
सिया अचानक चुप हो गई।
“क्या हुआ?”
“तू उससे दूर ही रहना…”
“क्यों?”
“क्योंकि वो किसी से बात नहीं करता।
किसी को पसंद नहीं करता।
और जिसने भी उससे पंगा लिया… वो बाद में खुद regret करता है।”
निशा हंस पड़ी।
“मैं डरने वालों में से नहीं हूं।”
उसी वक्त—
धड़ाम!
किसी लड़के ने पीछे से निशा की कुर्सी टक्कर मार दी।
उसके हाथ की cold coffee सीधे कपड़ों पर गिर गई।
“ओह सॉरी यार—”
लड़का हंस रहा था।
साफ लग रहा था जानबूझकर किया है।
निशा गुस्से में खड़ी हुई।
“दिमाग खराब है क्या?!”
वो लड़का जवाब देने ही वाला था कि अचानक किसी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
आरव।
पूरा कैंटीन शांत हो गया।
आरव की आवाज बहुत धीमी थी… लेकिन खतरनाक।
“Problem है?”
लड़का तुरंत पीछे हट गया।
“न-नहीं भाई…”
वो वहां से निकल गया।
निशा हैरानी से आरव को देखती रही।
“तुमने… मेरी help क्यों की?”
आरव ने उसकी तरफ देखा।
“गलत चीज पसंद नहीं।”
“लेकिन तुम तो खुद—”
“Rude हूं।
गिरा हुआ नहीं।”
कुछ सेकंड दोनों की आंखें एक-दूसरे पर टिकी रहीं।
फिर आरव वापस मुड़ गया।
निशा पहली बार confuse हुई थी।
“ये लड़का आखिर है कैसा…?”
उस रात—
निशा अपने कमरे में बैठी थी।
बारिश फिर शुरू हो चुकी थी।
लेकिन उसके दिमाग में बार-बार वही चेहरा आ रहा था।
ठंडी आंखें।
अजीब attitude।
और फिर अचानक की गई मदद।
उसने तकिया पकड़कर खुद से कहा—
“नहीं… ये अच्छा इंसान नहीं हो सकता।”
लेकिन दिल शायद पहली बार उसकी बात नहीं मान रहा था…
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