यह कहानी 2019 की फिल्म **'Joker'** (आर्थर फ्लेक) के उस दर्दनाक, अजीब और डरावने मिजाज से प्रेरित है। यह कहानी एक ऐसे शख्स की है जो अपनी जिंदगी के रंगमंच पर सिर्फ एक 'जोकर' बनकर रह गया, लेकिन जब उसने खेल के नियम बदले, तो पूरी दुनिया देखती रह गई।
## खेल का आखिरी जोकर (The Last Joker)
### भाग १: रंगमंच के पीछे का अंधेरा
शहर की गगनचुंबी इमारतों के बीच बसी तंग गलियों में एक छोटा सा, पुराना थिएटर था। यहाँ हर शाम 'द ग्रेट लाफ्टर शो' होता था। लोग आते, अपनी थकान भूलकर हँसते और चले जाते। इस शो का मुख्य आकर्षण था—**समीर**।
समीर का काम लोगों को हँसाना था। चेहरे पर सफेद रंग का गाढ़ा पेंट, आँखों के ऊपर नीले रंग के बड़े-बड़े आँसू के कतरे, और होठों पर लाल रंग की एक स्थायी, नकली मुस्कान। समीर जब स्टेज पर आता, तो गिरता, संभलता, अजीबोगरीब हरकतें करता और लोग ठहाके मारकर हँसते।
लेकिन उस सफेद मुखौटे के पीछे क्या था?
स्टेज के पीछे के छोटे से कमरे में, जहाँ एक मद्धम पीला बल्ब टिमटिमाता था, समीर आईने के सामने बैठता। वह अपने चेहरे का पेंट हटाने के लिए रुई उठाता, तो उसे आईने में अपनी आँखें दिखाई देतीं—उन आँखों में कोई चमक नहीं थी, सिर्फ एक गहरा, डरावना सन्नाटा था। समीर एक अजीब मानसिक बीमारी से जूझ रहा था। जब भी वह बहुत ज्यादा घबराता, दुखी होता या डर जाता, तो वह रोने के बजाय पागलों की तरह हँसने लगता। उसकी यह हँसी कोई आम हँसी नहीं थी; यह एक ऐसी चीख थी जो गले में घुटकर हँसी का रूप ले लेती थी।
"समीर! कल से तुम्हें अपनी परफॉरमेंस में कुछ नया करना होगा," थिएटर के मैनेजर, जगन लाल ने कमरे में सिगरेट का धुआँ उड़ाते हुए कहा। "लोग अब तुम्हारी पुरानी हरकतों से ऊब रहे हैं। अगर कल तालियाँ नहीं बजीं, तो अपनी नौकरी और यह कमरा दोनों भूल जाना।"
समीर ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला, लेकिन उसके गले से सिर्फ एक बेकाबू, तेज हँसी फूट पड़ी। वह हँसता रहा, उसकी छाती जोर-जोर से ऊपर-नीचे होने लगी, आँखों से पानी बहने लगा।
जगन लाल ने नफरत से उसे देखा, "अपनी यह बकवास हँसी मेरे सामने मत दिखाया करो। तुम पागल हो समीर। कल मुझे काम चाहिए, नाटक नहीं।"
### भाग २: उपेक्षा की सीढ़ियाँ
थिएटर से बाहर निकलकर समीर अपने घर की तरफ चल दिया। उसका घर शहर के सबसे गरीब और गंदे इलाके में, एक ढलान पर बनी लंबी, कंक्रीट की सीढ़ियों के ऊपर था। ये सीढ़ियाँ समीर के लिए उसकी जिंदगी की तरह थीं—थका देने वाली, अंतहीन और भारी।
रात के दो बज रहे थे। रास्ते में कुछ आवारा लड़के खड़े थे। समीर को ढीले-ढाले कपड़ों और कंधे पर एक पुराना झोला लटकाए आते देख उन्होंने उसे घेर लिया।
"ओए जोकर! कुछ जादू दिखा!" एक लड़के ने उसका झोला छीनते हुए कहा।
"कृपया... मुझे घर जाने दीजिए। मेरे पास कुछ नहीं है," समीर ने दबी आवाज में कहा। उसका दिल तेजी से धड़कने लगा था। उसे महसूस हो रहा था कि दौरा पड़ने वाला है।
"अरे, यह तो डर गया!" दूसरे लड़के ने समीर को धक्का दिया। समीर सीढ़ियों पर गिर पड़ा।
तभी, समीर के अंदर का वो दर्दनाक गुबार फूट पड़ा। वह सीढ़ियों पर लेटे-लेटे जोर-जोर से हँसने लगा। *'हाहाहा... हीहीही...'* उसकी हँसी रात के सन्नाटे को चीरने लगी। लड़के सहम गए। उन्हें लगा कि यह कोई पागल है। गुस्से में आकर उन्होंने समीर को लात-घूंसों से मारना शुरू कर दिया।
"हँसता है साला! और हँस!"
मार खाते हुए भी समीर की हँसी बंद नहीं हो रही थी। उसका चेहरा खून से लथपथ हो गया, लेकिन उसकी लाल रंग की पेंट की हुई वो नकली मुस्कान अब असली खून के साथ मिलकर और भयानक दिखने लगी थी। लड़के उसे अधमरा छोड़कर भाग गए।
समीर घंटों वहीं सीढ़ियों पर पड़ा रहा। उसने आसमान की तरफ देखा, जहाँ काले बादलों के पीछे चाँद छुपा हुआ था। उसने खुद से पूछा—*क्या मेरी जिंदगी सिर्फ एक मजाक है? अगर हाँ, तो इस मजाक का लेखक कौन है?*
### भाग ३: खेल के नए नियम
अगले दिन, समीर अपनी चोटों को छुपाने के लिए चेहरे पर और गाढ़ा मेकअप लगाकर थिएटर पहुँचा। आज शो का सबसे बड़ा दिन था। शहर के कई अमीर और रसूखदार लोग अगली कतारों में बैठे थे। जगन लाल ने समीर को चेतावनी दी थी कि आज कोई गलती नहीं होनी चाहिए।
समीर स्टेज के पीछे खड़ा अपनी बारी का इंतजार कर रहा था। तभी उसने जगन लाल को किसी से फोन पर बात करते सुना।
"हाँ सर, आज का शो खत्म होते ही मैं समीर को निकाल दूँगा। मैंने उसके रिप्लेसमेंट का इंतजाम कर लिया है। वह वैसे भी एक पागल है, बस कुछ दिन और इस्तेमाल करना था।"
समीर के कानों में वो शब्द पिघले हुए सीसे की तरह उतरे। *'इस्तेमाल... पागल... जोकर...'*
समीर के दिमाग में जैसे कुछ टूट गया। एक अजीब सी शांति उसके अंदर फैल गई। डर, घबराहट, और चिंता—सब कुछ गायब हो गया। उसने महसूस किया कि वह अब तक दूसरों की शर्तों पर जी रहा था। वह दूसरों को हँसाने के लिए खुद को चोट पहुँचाता था। लेकिन अब और नहीं।
"देवियों और सज्जनों!" अनाउन्सर की आवाज गूंजी। "अब आपके सामने आ रहे हैं—आपके चहेते जोकर समीर!"
समीर स्टेज पर आया। लेकिन आज उसकी चाल में कोई लड़खड़ाहट नहीं थी। वह बिल्कुल सीधा, आत्मविश्वास से भरा हुआ चल रहा था। उसके चेहरे पर जो मेकअप था, वह थोड़ा बिखरा हुआ था, जैसे किसी ने उसे आंसुओं से धोया हो।
भीड़ ने तालियाँ बजाईं। समीर स्टेज के बीचों-बीच रखे माइक के सामने खड़ा हो गया। सन्नाटा छा गया। लोग उम्मीद कर रहे थे कि वह कोई मजाकिया हरकत करेगा, गिरेगा या अजीब चेहरा बनाएगा।
लेकिन समीर बस शांत खड़ा रहा। उसने दर्शकों की तरफ देखा।
"आप सब यहाँ क्यों आए हैं?" समीर ने बहुत ही शांत और गंभीर आवाज में पूछा।
दर्शक आपस में कानाफूसी करने लगे। अगली कतार में बैठा एक अमीर आदमी चिल्लाया, "अरे जोकर! बकवास बंद कर और नाटक शुरू कर!"
समीर मुस्कुराया। इस बार उसकी मुस्कान असली थी। "आप लोग मुझे जोकर कहते हैं। आप उस पर हँसते हैं जो आपसे अलग है। आप उस पर थूकते हैं जो कमजोर है। लेकिन जानते हैं सबसे मजेदार बात क्या है?"
समीर ने अपनी जेब में हाथ डाला। वहाँ जगन लाल की वो पुरानी रिवॉल्वर थी, जिसे उसने स्टेज के पीछे से चुराया था।
"सबसे मजेदार बात यह है कि आप लोग सोचते हैं कि आप सुरक्षित हैं।" समीर ने रिवॉल्वर निकाली और उसे सीधे आसमान की तरफ तान दिया।
पूरे हॉल में चीख-पुकार मच गई। लोग अपनी सीटों से उठकर भागने लगे। जगन लाल स्टेज के किनारे से चिल्लाया, "समीर! यह क्या पागलपन है? बंदूक नीचे करो!"
समीर ने बंदूक घुमाई और जगन लाल की तरफ तान दी।
"जगन जी, आपने कहा था कि मेरी हँसी बकवास है। चलिए, आज आपको एक असली जोक सुनाता हूँ," समीर ने कहा, उसकी आँखों में एक अजीब सा पागलपन तैर रहा था। "एक जोकर था, जिसने पूरी जिंदगी दूसरों को हँसाने में बिता दी। जब वह खुद रोया, तो लोगों ने उसे लात मारी। तो जोकर ने सोचा... क्यों न खेल के नियम ही बदल दिए जाएँ?"
*'धांय!'*
एक जोरदार आवाज हुई। जगन लाल वहीं ढेर हो गया। पूरा थिएटर खौफ से कांप उठा। चारों तरफ भगदड़ मच गई। लोग दरवाजों की तरफ भाग रहे थे, कुर्सियाँ टूट रही थीं।
लेकिन समीर वहीं खड़ा रहा। उसने उस भगदड़ को देखा, उस डर को देखा जिसे उसने खुद पैदा किया था। उसे एक असीम शक्ति का अहसास हुआ। वह जोर से हँसने लगा—इस बार उसकी हँसी में कोई दर्द नहीं था, कोई घबराहट नहीं थी। यह एक विजेता की हँसी थी।
### भाग ४: सीढ़ियों का जश्न
पुलिस की गाड़ियाँ सायरन बजाती हुई थिएटर की तरफ दौड़ रही थीं। समीर पिछले दरवाजे से बाहर निकल गया। उसने अपने ढीले कपड़े उतार दिए थे। अब उसने एक गहरे लाल रंग का सूट पहन रखा था, जो उसने जगन लाल के केबिन से चुराया था। उसका चेहरा अभी भी सफेद, नीला और लाल था।
वह अपनी उसी पुरानी सीढ़ियों पर पहुँच गया।
हल्की-हल्की बारिश शुरू हो गई थी। आसमान से गिरती बूंदें उसके चेहरे के पेंट को धीरे-धीरे बहा रही थीं। समीर ने अपने फोन पर एक सुरीला, पुराना संगीत बजाया।
और फिर, उसने नाचना शुरू किया।
वह उन सीढ़ियों पर ऐसे नाच रहा था जैसे वह दुनिया का सबसे आजाद इंसान हो। उसके पैर हवा में तैर रहे थे, उसकी बाँहें फैली हुई थीं। हर एक कदम के साथ, वह समाज के उस हर जुल्म को लात मार रहा था जो उसने सालों से सहा था। वह अब कोई लाचार समीर नहीं था। वह **जोकर** था। एक ऐसा प्रतीक, जो इस बेरहम शहर की बर्बादी का जश्न मना रहा था।
नीचे पुलिस की गाड़ियाँ आकर रुकीं। लाल और नीली बत्तियाँ सीढ़ियों पर नाचते हुए जोकर पर पड़ रही थीं। पुलिस वाले बंदूकें तानकर चिल्लाए, "हाथ ऊपर करो और वहीं रुक जाओ!"
समीर सीढ़ियों के बीच में रुक गया। उसने पुलिस वालों की तरफ देखा, फिर शहर की उन गगनचुंबी इमारतों की तरफ देखा जहाँ अमीर लोग रहते थे। उसने अपने दोनों हाथों की उंगलियों को अपने मुँह के कोनों पर रखा और उन्हें ऊपर की तरफ खींचकर एक बड़ी, खूनी मुस्कान बनाई।
"मैंने हमेशा सोचा था कि मेरी जिंदगी एक त्रासदी (Tragedy) है," समीर ने धीरे से कहा, जो तूफान की गड़गड़ाहट में भी साफ सुनाई दिया। "लेकिन अब मुझे समझ आया... कि यह तो एक कॉमेडी (Comedy) है।"
वह पुलिस की तरफ बढ़ा, उसकी आँखों में कोई डर नहीं था। खेल अब खत्म हो चुका था, और जोकर ने अपनी आखिरी बाजी जीत ली थी।
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