Mystery OF Y.S
रविवार का दिन था...,
एक छोटा सा घर...,
"म्म्मी ड्रेस जल्दी पहनाओं"- एक 8 साल की मासूम बच्ची अपनी मां से खुद कुछ भी तैयार करने के लिए कहती हैं।
"हां..., हां.., तारू एक मिनट.. यह बताओ कि इतनी जल्दी क्यों कर रही हो?" - उस बच्ची की मां ने ड्रेस पहनाते हुए कहां।
"आपकौ तो पता हैं..., कि थोड़ी सी भी देरी की तो मामू फिर से काम का बहाना या फिर दोस्तों से मिलने का बहाना बनाकर बाहर चले जाएंगे.., बस इसीलिए और आप जल्दी से यह ड्रेस पहनाइए"- वो बच्ची मासूम आवाज में कहती हैं।
"नहीं आज तुम्हारे कबीर मामू.., आज तुम्हें तुम्हारी फेवरेट जगह पर ले जाने से पहले कहीं पर नहीं जाएंगे तो तुम ज्यादा नहीं सोचों.., लो हो गई तुम तैयार..,"- उसकी मां ने कहा।
"गुड म्म्मा, मैं मामू कें पास जाती यह देखनें की वो रेडी हूं या नही और जब तक मैं वापस आती हूं जब तक आप रेडी हो जाईए"- बो बच्ची सीढ़ियों पर भागते हुए सेकंड फ्लोर पर जाने वाली सी सी की तरफ जाती है।
"अरे धिरे से तारू बच्चा"- वह महिला अपनी बच्ची को आराम से जाने के लिए कहती है। लेकिन वह बच्ची बिना सुने ही आगे बढ़ गई।
"मामू.. मामू.. कबीर मामू..,"- एक रूम की तरफ भागती हैं, गेट थोड़ा सा फिर हुआ था, जो कि थोड़ा सा धक्का देने पर ही खुल जाता है।
"मामू आप तैयार हो तो चले"- छोटे से बेड एक 25 साल का शख्स बैठकर अपन शूलेश बांद रहता था। जिसे देखो बच्ची उसके पास
"अरें..., तारू बच्चा आप इतनी जल्दी तैयार हो गई ?".., वह शख्स अपनी सूलेश बंद जाने के बाद उसे बच्चों को अपने पास बैठाता है।
"मुझे तो होना ही अखीर मुझे मेरी म्म्मा ने जो रेडी किया आपकी तरह थोड़ी आधे से ज्यादा समय ड्रेस देखने मैं लगा दो"- बो बच्ची अपने मामू की बिस्तर पर पहले कपड़ों को देखकर कहते हैं।
"हां.., भाई यह तो हैं.., अच्छा आप पिंक फ्रॉक एक लिटिल डोल की तरह लग रही हों"- बो लड़का कहता हैं।
"वैसे आप भी ब्लैक पेंट व्हाइट शर्ट मैं पहने कुछ कम नहीं लग रहें हों"- बच्ची ने कहा।
"अरें... थैंक्यू बच्चा"- कबीर ने कहा। मुस्कुराते हुए उसके गालो को छुता हैं।
वो दोनों रूम में बाहर आंतें हैं।
"तारू तूम्हारी म्म्मा कहां हैं?। क्या वो हमारे साथ नहीं देगी क्या?"-घर के छोटे हाँल मै अपनी बहन को ना देख कहा।
"म्म्मा हमारे साथ जाएगी वो अभी रेडी हो रही हैं"- तारु ने कहां।
"तो ठीक आप यही रूको... हम ऑटो लेकर आते हैं"- कबीर धर का दरवाजा खोल बाहर निकल जाता हैं।
"तारू बेटा आप यहां बेठी क्या कर रही... छोटे कहा हैं"- बो आवाज को सामने देखती हैं।
उसकी मम्मी ने 4 महीने पहले से ही अचानक कलरफुल ड्रेस इस्तेमाल करना छोड़ सफेद साड़ी उसे करनी चालू कर दिया था। किस करण की वजह से यह उसे बच्ची को नहीं पता।
"म्म्मा... मामू बाहर गए हैं बस 5 मिनट में आते होंगे..., पहले आप यह बताओ आज भी आपने यह सफेद रंग की साड़ी क्यो पहनी हैं"- तारू में कहा। जो सून उस बच्ची की मम्मी कुछ देर शांत हो जाती हैं।
तारू बात यह हैं... कि तुम्हारी म्म्मा को व्हाइट कलर पसंद है। इसीलिए वह व्हाइट कलर की साड़ी पहनना पसंद करती हैं"- उस बच्ची की मां कुछ बोलती अच्छे से कबीर की आवाज आती है।
दोनों कबीर की तरफ देखतें हैं...
जहां उस बच्ची की मां आंखों में आंसू और एक अजीब सी दर्द के साथ उसको देख रही थी, कन्फ्यूज्ड उसकी तरफ देख रही थी।
"पर भैया एक ही कलर को इतना भी क्या पसंद करना..., कि आप उसको 3-3 मंथ तक कैरी करो"- बहुत अच्छी नाराजगी से बोलती है। कबीर जो उसे बच्चों की मां की आंखों में सुखी आंसू देख रहा था। बो बच्चों की तरफ देखता हैं।
"बच्चा पसंद की जाने वाले रंग का प्रयोग कितने समय तक कियेजा सकती है.. एग्जांपल के लिए आप खुद को देख लो आप अपनी स्कूल ड्रेस को कितना पसंद करती है.. वह भेजो व्हाइट कलर की है ना.. पूरी ईयर कैरी करती हो.. हैं ना?"- कबीर अपनी एक अपने एक लुटने पर बैठ उस बच्ची को समझता है।
जोकि अपने मामू के इतनी प्यार से समझाने पर समझ भी जाती है।
"अच्छा ठीक है... आपके कहने पर मान जाती हूं"- बच्ची ने कहां। जो सूनकर कबीर मुस्कुराता और बच्ची की मां की तरफ देख पलके झपकाता हैं।
"मामू आप ऑटो ले आए हैं.. तो चलें"- बो बच्ची बोलती हैं। जो सून दोनों उसकी तरफ देखते हैं।
"हां.. चलो"- कबीर के कहने पर सब धर कें बाहर जाते हैं... जहां बच्ची की अपने घर के दरवाजे पर ताला लगाती हैं।
"मामू हम आपकी बाइक होते हुए ऑटो से क्यो जा रहे हैं"-बच्ची ने नीली रंग के कार कवर से ढकी टू व्हीलर दो देख कहा।
"क्योकि बेटा इस समय धूप बहुत तेज पड़ रही है.. ऐसे में बाइक चलाना सही नहीं है"- कबीर ने कहा।
"तुम सही बोल रहे हो छोटें"- उस बच्ची कीं मां आतैं हुए कहती हैं।
घर के बाहर खड़े एक ऑटो खड़ा था, जिसमें सबसे पहले बच्ची की मां, फिर बच्ची और अखीर मैं कबीर ऑटो मैं बैठ जाता हैं, जिसके बाद ऑटो पहले से ही तय की हुई जगह की तरफ चल देता हैं।
दूसरी तरफ
सिंघानिया विला...,
जिसके गेट से ब्लैक बेंटले गाड़ी दाखिल होती हैं। जिसकें आगे का डोर ओपन कर एक व्यक्ति बाहर आता हैं। जो बैक साइड डोर ओपन करता हैं, जहाँ से एक 51 साल का शख्स बाहर निकल कर आया हे। जिसने प्रॉपर बिजनेस सूट कैरी किया हुआ था। यह हें.. सिंघानिया इंडस्ट्री'स कैं चैयरमैन जितेंद्र सिंघानिया
यह हें.. सिंघानिया इंडस्ट्री कैं चैयरमैन जितेंद्र सिंघानिया..., उनके लिए कर डोर ओपन करने वाला उनका पर्सनल असिस्टेंट राधव सिंह जो कि जितेंद्र सिंघानिया के साथ काफी सालों से काम कर रहें हैं।
जितेंद्र सिंघानिया... उस विला कें अन्दर जातें हैं.... और राघव सिंह बाहर ही रुक जातें हैं।
विला के अन्दर काफी शांति थी.., सूरज की किरणें उसे बिना की बड़ी-बड़ी लड़कियों को पार कर घर के अंदर आ रही थी.., वहाँ इस समय एक भी सर्वेंट नहीं था.., क्योंकि इस समय दोपहर के 3:00 बजे रहे थे.., और सर्वेंट सर्वेंट क्वार्टर में आराम करने गए हुए थे।
"मोहन काका"- जितेंद्र सिंघानिया आवाज लगाते हैं। जिनकी आवाज को सून 70 साल के एक काका बाहर आतैं हैं। मोहन काका सिंघानिया फैमिली में जितेंद्र सिंघानिया जी के पिता के समय से काम कर रहे हैं।
"जी जितेंद्र साहब"
"क्या वैशाली ने दोपहर का खाया"
"नहीं साहब.. मैं खाना लेकर गया था लेकिन मैंम ने नहीं खाया... इसीलिए मैंने करके बुलाया"
"ठीक हैं.. दो प्लेट लेकर रूम में आईए"- जो बोल जितेंद्र सिंघानिया जी सीढ़ियों से होते हुए सेकंड फ्लोर पर एक रूम की तरफ जातें हैं, तो काका भी किचन में चले जाते हैं।
जितेंद्र सिंघानिया एक रूम के पास जाकर रुकते हैं। धिरे दरवाजा खोल रूम कैं अन्दर दाखिल होते हैं। जहाँ उनकी नज़र एक महीला पर पड़ती हैं। जिसने शाही साड़ी पहनी हुई थी। जिसकी 68 साल के आस पास थी। यह हें..जितेंद्र सिंघानिया की पत्नी "वैशाली सिंघानिया" जो कि इस समय एक 19 साल के लड़के की तस्वीर पकड़ी हुई थी, जिसने दूल्हे की शेरवानी पहनी थी।
"मोहन काका मैंने कहां ना मुझे कुछ नहीं चाहिए"- वेशाली जी ने किसी की आहट महसूस कर तस्वीर पर से ध्यान बगैर हटाए कहा।
"वैशाली जी.. मोहन काका नहीं यह हम हैं"- एक जानी पहचानी आवाज सून और एक हाथ अपने कंधे पर महसूस कर वैशाली जी ने पिछे मुड़ कर देख जहाँ पर उनके पति जितेंद्र जी दिखाई देते हैं।
"मैं कैसी हो सकती हूं.. वैसे क्या हुआ आज आप ऑफिस से इतनी जल्दी घर पर आ गए"- वैशाली ने कहा। और अपनी आंखों सें आंसू साफ़ करती हैं। जो सुनकर जितेंद्र उन्हें देखने लगते हैं। जिसमें कमरे शांति हो जाती हैं।
"क्या मैं अन्दर आ सकतें हैं"- रूम के बाहर से मोहन काका की आवाज आती हैं। जो कमरे में मौजूद शांति को दूर कर देती हैं।
"आ जाइए"- जितेंद्र जी कहते हैं। मोहन काका अंदर आते हैं.. प्लेट को जितेंद्र सिंघानिया के पास कांच की टेबल पर रख एक नज़र अपनी मालकिन को देख रूम से बाहर नीकल जाते हैं।
"मुझे पता चला कि.. आपने दोपहर का लंच नहीं किया है... तो इसलिए मुझे आना पड़ा"- जितेंद्र जी खाने की प्लेट उठाकर वैशाली जी के पास बेड के एक साइड बैठ जाते हैं।
"मुझे भूख नहीं.. आप ज्यादा जोर मत कीजिए"- वैशाली जी कहती हैं।
"देखिए आपको खाना खाना पड़ेगा चाहे कुछ भी हो जाए आपको दवाई भी खानी होती हैं... तो आप इसमें लापरवाही नहीं वरत सकती हैं... और आप कब तक अतीत की यादों में डूबी रहेगी अब आपको उससे बाहर आना चाहीए"- जितेंद्र की सख्ती कें तेज आवाज मैं कहते हैं।
"आप तो उभर गये लेकिन मैं कैसे भूल उस याद को क्योकि मैनें अपने उस बच्चे को कभी प्यार दिया तो वो अपने इतने बड़े दिन ही नाराज़ हो मुझसे हम सबसे दूर चला गया। और आप कहते हैं.. यह सब भूल जाऊ"- वैशाली जी भी अपनी जगह से खड़ी हो तेज आवाज बोलती हैं।
वैशाली जी को इस तरह पैनिक होता देख...
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