काशी एक याद
"कुछ मुलाक़ातें सिर्फ़ एक दिन नहीं बदलतीं... पूरी ज़िंदगी बदल देती हैं।"
वाराणसी... एक ऐसा शहर जहाँ हर सुबह गंगा की लहरें नया सूरज लेकर आती हैं और हर शाम आरती की लौ में हज़ारों कहानियां चमक उठती हैं। लोग कहते हैं कि इस शहर में जो एक बार आ जाए, वो कभी पूरी तरह यहाँ से जा नहीं पाता।
शायद इसलिए... मैं भी आज तक बनारस से नहीं निकल पाया। शरीर कहीं भी चला जाए... यादें हमेशा यहीं लौट आती हैं। आज भी जब किसी दूर से आती गिटार की आवाज़ सुनता हूँ, तो आँखों के सामने वही दिन घूम जाता है।
वही स्कूल।
वही स्टेज।
और...
वही लड़की। काशी।
लोग पूछते हैं—
"क्या वो तुम्हारा पहला प्यार थी?"
मैं हर बार मुस्कुरा देता हूँ।
क्योंकि कुछ रिश्ते मोहब्बत से भी बड़े होते हैं।
और कुछ बिछड़ने... मौत से भी ज़्यादा दर्द देते हैं।
...
साल 2012
"निशांत... उठ जाओ बेटा, देर हो जाएगी।"
माँ की आवाज़ कानों में पड़ी तो मेरी आँखें खुली।
घड़ी में सुबह के छह बज रहे थे।
आज का दिन अलग था।
आज मैं पहली बार Little Flower House की तरफ़ से Glenhill School में होने वाले इंटर-स्कूल म्यूज़िक प्रोग्राम में भाग लेने जा रहा था।
दिल में उत्साह भी था...
और डर भी।
कमरे से बाहर निकला तो बड़ी बहन निधि पहले से तैयार खड़ी थी।
"आज तो हमारे Rockstar साहब बड़े चुप हैं।"
मैं हँस पड़ा।
"दीदी... थोड़ा नर्वस हूँ।"
निधि ने मेरे बाल ठीक किए।
"स्टेज से डरने वाला इंसान कभी कलाकार नहीं बनता।"
उसकी बात सुनकर मन थोड़ा हल्का हो गया।
नीचे पिताजी एम. एन. मिश्रा चाय पी रहे थे।
उन्होंने अख़बार मोड़कर मेरी तरफ़ देखा।
"आज जीतने नहीं... सीखने जाना।"
मैंने उनके पैर छुए। उन्होंने सिर पर हाथ रखा।
"भगवान तुम्हारा भला करे।"
रसोई से माँ काव्या की आवाज़ आई—
"नाश्ता किए बिना कोई कहीं नहीं जाएगा।"
तभी पीछे से तीन आवाज़ें एक साथ आईं।
"भैया...
अगर स्टेज पर भूल गए तो?"
मैंने पीछे देखा।
अनिमेष चौबे...
अभिषेक चौबे...
और सबसे छोटा...
नवनीत मिश्रा।
तीनों हँसी रोकने की कोशिश कर रहे थे।
मैंने बनावटी गुस्से में कहा—
"शाम को आकर देख लेना... अगर अच्छा बजाया तो तुम लोगों से आइसक्रीम खिलाऊँगा।"
"और अगर हार गए?"
अभिषेक ने पूछा।
मैं हँस पड़ा।
"तो तुम लोग खिलाना।"
पूरा घर हँसी से भर गया।
उस समय किसी को अंदाज़ा नहीं था...
कि कुछ साल बाद यही घर...
मेरी ख़ामोशी से भर जाएगा।
...
साढ़े सात बजे मैं स्कूल पहुँचा।
म्यूजिक रूम के बाहर पहले से कई बच्चे खड़े थे।
अंदर से गिटार की आवाज़ आ रही थी।
दरवाज़ा खोला।
अंदर वैभव सर बैठे थे।
मेरे म्यूजिक कोच।
उनकी उँगलियाँ गिटार पर इतनी आसानी से चल रही थीं कि लगता था जैसे गिटार उनसे बातें कर रहा हो।
उन्होंने मुझे देखा।
"आ गए?"
"जी सर।"
उन्होंने गिटार नीचे रखा।
"डर लग रहा है?"
मैं चुप रहा।
उन्होंने मुस्कुराकर कहा—
"लगना भी चाहिए। जिस दिन स्टेज पर जाने से पहले डर खत्म हो जाएगा...उस दिन सीखना भी खत्म हो जाएगा।"
मैंने सिर झुका दिया। उन्होंने मेरा गिटार लिया। एक-एक स्ट्रिंग चेक की। फिर वापस मुझे देते हुए बोले—
"आज लोगों को इंप्रेस मत करना... बस दिल से बजाना।"
इतने में दरवाज़ा खुला।
"सर... बस आ गई।"
ये हिमांशु पीटर था।
उसके हाथ में ड्रम स्टिक थीं।
हम सब बस की तरफ़ बढ़ गए।
...
रास्ते भर मैं खिड़की से बाहर देखता रहा।
वाराणसी अपनी रफ़्तार में था।
कहीं स्कूल जाते बच्चे... कहीं मंदिरों की घंटियाँ...
कहीं सड़क किनारे चाय की भाप...
सब कुछ इतना सामान्य था कि कोई यक़ीन ही नहीं कर सकता था कि इसी शहर में एक दिन मेरी पूरी दुनिया बदल जाएगी।
करीब चालीस मिनट बाद बस ग्लेनहिल स्कूल के सामने रुकी।
मैंने पहली बार उस स्कूल को इतने करीब से देखा।
बड़ा-सा गेट। हरे-भरे पेड़। साफ़-सुथरा कैंपस। हर तरफ़ रंगीन पोस्टर। स्कूल के बच्चे मेहमानों का स्वागत कर रहे थे।
मैंने गहरी साँस ली। वैभव सर ने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
"रेडी?"
मैंने धीरे से कहा—
"यस, सर."
लेकिन सच तो ये था...
मैं बिल्कुल तैयार नहीं था।
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