Arrange Marriage

Arrange Marriage

Chapter 1

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फर्श पर चादर बिछी थी। दीवार के सहारे तकिया रखा था। मैं वहीं थी—सोफे पर, हाथ में वही तकिया, दिल धड़क रहा था किसी अनजान डर से। शादी के पहले दिन की रात। जिस आदमी से मैंने उम्र भर नफरत की थी, उसके घर में, उसके कमरे में, उसकी ज़िंदगी में। एक उम्र जो अब मेरी भी थी।

और वह? सोफे के दूसरे छोर पर, तकिया लेकर बैठा था। बहस नहीं की। कोई दलील नहीं दी। बस उठा, तकिया उठाया, और आकर लेट गया। जैसे यह उसकी आदत हो। जैसे उसे कोई फर्क न पड़ता हो।

फिर आधी रात को खिड़की से एक काली बिल्ली आई।

मैं चीखी। उस तरह नहीं जैसे कोई बहाना बनाने के लिए चीखता है। असली चीख। गले से निकली हुई, हवा को चीरती हुई, उस अंधेरे को भरती हुई जो कमरे में था और मेरे अंदर भी। पसीने से तर हथेलियाँ। घुटने काँप रहे थे। मेरा शरीर मेरा नहीं रहा।

वह उछल पड़ा। पलक झपकते ही सोफे से उठा, पैरों तले ज़मीन नहीं थी। "क्या हुआ?"—आवाज़ भारी थी, नींद से भरी, लेकिन उसमें एक तेज़ी थी, एक सतर्कता जो सिर्फ उन लोगों में होती है जिन्होंने कभी खतरा देखा हो।

"बिल्ली। काली बिल्ली।"

उसने देखा। बिल्ली खिड़की पर बैठी थी, आँखें चमक रही थीं। वह झटके से उठा, बिल्ली को उठाया—बिना किसी झिझक के—और खिड़की से बाहर फेंक दिया। खिड़की बंद की। कुंडी लगा दी। फिर मुड़ा। मेरी तरफ देखा। उसकी आँखों में वह सख्ती नहीं थी जो मुझे याद थी। कुछ और था।

फोन बजा।

उसने झटके से जेब से फोन निकाला, स्क्रीन पर नाम देखा—भाई—और बिना सोचे स्पीकर ऑन कर दिया। आदत। सीईओ की आदत। माफिया की आदत। उसकी आदत।

"भैया, अपका सैतान आधी रात को ही ज्यूँ जगता है। तरस खालो भाभी पे और सोने दो मुझे।"

फिर लाइन कट गई।

मैं वहीं बैठी रही। आँखें नीचे। गाल जल रहे थे। मेरे हाथों में वही तकिया था, लेकिन अब वह भी भारी लग रहा था। कानों में वह आवाज़ गूँज रही थी—भाभी पे तरस खालो। उसे क्या पता था कि हम सोफे पर थे, दो अजनबियों की तरह, एक-दूसरे से कोसों दूर?

उसने फोन रखा। "वह बेवकूफ है। छोड़ो उसे।" आवाज़ में नाराज़गी थी, लेकिन वह मुझसे नहीं थी। वह अपने भाई से थी। मुझसे नहीं।

वह वापस सोफे की तरफ बढ़ा। मैंने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखें मेरी आँखों से मिलीं। फिर मैंने नीचे देख लिया। अपने नाइटसूट के फूलों को देखा। उन फूलों को जिन्हें मैंने पहनने से पहले सौ बार देखा था, लेकिन अब वे भी अजनबी लग रहे थे।

"सो जाओ। कल तुम्हें जल्दी उठना है, पता है न?"

मैंने सिर हिलाया। "हाँ, ठीक है। फिर... क्या पहनूँ कल?"

उसने सोफे की ओर देखा, फिर मेरी तरफ। "साड़ी ही पहन लेना। जब तक माँ-पापा हैं, ठीक रहेगा।"

"ठीक है फिर।" मैं लेट गई। सोफे पर। उसी सोफे पर जहाँ वह बैठा था। "आप सो जाइए।"

वह ठिठक गया। दरवाज़े की तरफ बढ़ रहा था, हाथ बत्ती के स्विच पर था, लेकिन रुक गया। मेरी तरफ देखा। फिर खाली जगह पर, जहाँ मैं लेटी थी, और फिर ऊपर मेरी आँखों में। "यह क्या कर रही हो? बेड पे जाओ। मैं यहीं ठीक हूँ।" आवाज़ नरम थी। वह किनारा नहीं था जो मुझे याद था।

"नहीं। मुझे डर लग रहा है। अकेले।"

उसने हाथ स्विच से हटा लिया। उसके होंठों के कोने पर एक मुस्कान आई—पूरी नहीं, लेकिन लगभग। उसने जबड़ा सिकोड़ा। एक पैर से दूसरे पैर पर वज़न डाला। फिर सिर हिलाया। "ठीक है।" उसने कुर्सी से दूसरी चादर उठाई, और हम दोनों पर डाल दी। फिर बैठ गया। मुझसे उतनी दूर जितनी सोफा इजाज़त देता था।

"आप नहीं सोएँगे क्या?" मैं उठकर बैठ गई। "अगर आप नहीं चाहते तो मैं अकेली बेड पे सो जाऊँगी।"

वह पहले से ही आर्मरेस्ट पर झुका हुआ था, आँखें आधी बंद। उसने पलकें झपकाईं, मेरी तरफ देखा। बाहर की स्ट्रीटलाइट ने उसकी ठुड्डी पर उगी दाढ़ी को पकड़ लिया। वह नरम लग रहा था। "मैं ठीक हूँ। तुम सो जाओ। डर मत लगना। मैं यहाँ हूँ।" आवाज़ नींद से भरी थी। केवल मैं ही सुन सकती थी।

"तो फिर ऐसे क्यों बैठे हैं?" मैं नहीं लेटी। "एक काम कीजिए। हम दोनों बेड पे सो जाते हैं। काफी जगह है।"

वह सीधा होकर बैठ गया। पूरी तरह जाग गया। उसकी भौंहें सिकुड़ गईं, जैसे वह जाँच रहा हो कि उसने सही सुना है। हवा ठहर गई। उसकी काली आँखें मेरे चेहरे पर थीं—किसी चाल की तलाश में। बचपन की आदतें जल्दी नहीं जातीं। "तुम ठीक हो न? आज ही शादी हुई है। तुम कम्फर्टेबल हो?"

"ऐसे क्यों पूछ रहे हो?"

वह सोफे पर पीछे झुक गया। उंगलियाँ एक बार लकड़ी के आर्मरेस्ट पर थिरकीं। उसके होंठों पर एक सूखी, आधी मुस्कान थी। वह मेरा इतिहास जानता था। हर लड़ाई। हर झूठ। हर बार जब मैं उसी कमरे में नहीं रहना चाहती थी जहाँ वह था। "क्योंकि तुमने कभी मुझपर भरोसा नहीं किया न। अब भी तुम अपने मन से नहीं हो यहाँ।"

"पता है।" मैंने उसकी तरफ देखा। "लेकिन अब तो हूँ न।"

उसकी उंगलियाँ थिरकना बंद हो गईं। वह मुझे देखता रहा। एक लंबा, खामोश पल। हवा में वे सारी बातें थीं जो कभी नहीं कही गईं—सालों की नफरत, यह जबरदस्ती की शादी, वह खामोश बदलाव जो आज रात हुआ था। उसने पलकें झपकाईं, फिर धीरे से सिर हिलाया। उठा। तकिया उठाया। "ठीक है। चलो। मैं बेड के दूसरी साइड पे सो जाऊँगा। तुम्हें परेशान नहीं करूँगा।"

मैंने सिर हिलाया, तकिया उठाया, और उठकर खड़ी हो गई। "मुझे अकेली छोड़ के मत जाना।"

वह बेडरूम के दरवाज़े पर रुका। एक हाथ चौखट पर था। उसने पीछे मुड़कर मुझे देखा। उसकी छाती सिकुड़ गई—मेरी आवाज़ में वह कमज़ोरी, वह नन्ही सी बात, जो मैंने कभी किसी से नहीं कही थी। "नहीं छोड़ूँगा। चलो, चलो। मैं यहाँ हूँ तुम्हारे साथ।" उसने मेरे लिए दरवाज़ा खोला। उसके कदम मेरे पीछे-पीछे थे, हल्के, खामोश।

"ठीक है।"

उसने दरवाज़ा बंद किया। साइड टेबल का लैंप जलाया—हल्की रोशनी, नरम। वह बेड के दूर छोर पर चढ़ा। हमारे बीच एक फुट की जगह थी। उसने हाथ छाती पर रख लिए। छत पर देखता रहा। हिला नहीं। एक इंच भी नहीं। "लाइट बंद कर दूँ? या तुम्हें थोड़ी रोशनी चाहिए?"

"नहीं। बंद मत करो।"

मैंने उसका हाथ पकड़ लिया। उससे पहले कि वह बत्ती बंद करता।

उसका पूरा शरीर ठहर गया। जैसे उसने साँस लेना बंद कर दिया हो। वह वहीं जम गया, आधी हरकत में। फिर धीरे से अपना सिर घुमाया। हमारे जुड़े हाथों को देखा। फिर मेरे चेहरे को। उसने हाथ नहीं छुड़ाया। "ठीक है। लाइट ऑन रहने देंगे। ओके?"

"हाँ।"

उसने अपना हाथ मेरे हाथ में छोड़ दिया। ढीला, ताकि मैं कभी भी छुड़ा सकूँ। उसका अंगूठा अनजाने में मेरे पोरों पर गोलाई काटने लगा। वह तकिये पर लेट गया, आँखें खुली थीं, पर्दे का साया देख रहा था जो पंखे से हिल रहा था। "आराम से सो जाओ। सुबह तुम्हें हलवा चाहिए न? मम्मी बनाएँगी कल।"

"लेकिन मेरी मम्मी कह रही थीं पहली रसोई मुझे करनी होगी।"

वह धीरे से हँसा। उसकी हँसी में वह सख्ती नहीं थी जो मुझे याद थी। उसने मेरा हाथ एक बार दबाया—धीमा, स्थिर। "कोई बात नहीं। मैं तुम्हें सिखला दूँगा। अगर जल भी जाए तो हम बाहर से निकाल लेंगे, किसी को पता नहीं चलेगा।"

"ठीक है फिर।"

वह मेरे चेहरे से नज़रें नहीं हटा रहा था। उसका अंगूठा अब भी मेरे पोरों पर गोलाई काट रहा था। कमरे में सिर्फ पंखे की आवाज़ थी। उसने आँखें बंद कीं। उसके होंठों के कोने पर वह नरमी थी। "मैं तुम्हारे साथ हूँ। कोई टेंशन नहीं। सो जाओ अब।"

"मुझे कल सुबह जल्दी नींद से जगा देना।"

उसने सिर हिलाया। बिना मतलब के थोड़ा और करीब आ गया। उसके बाँह की गर्मी चादर के पार से आ रही थी। उसने मेरा हाथ हल्के से दबाया। उसकी साँस धीमी हो रही थी। "हाँ, जगा दूँगा। अब आँख बंद करो। देर हो गई है।"

"हाँ।"

मैंने आँखें बंद कर लीं।

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सुबह जल्दी, लिनेन के पर्दों से छनती हुई रोशनी आ रही थी। मेरे बाल तकिये पर बिखरे हुए थे, उनके किनारों पर सुनहरा रंग था। वह अलार्म से पहले जाग गया। मेरा हाथ अब भी उसके हाथ में था। और मैं—मैं उसकी तरफ सिकुड़ कर आ गई थी। नींद में। उसकी छाती से सटी हुई।

वह हिला नहीं। वहीं ठहर गया। मेरी साँसों को सुनता रहा—हल्की, नरम, उसकी छाती पर गिरती हुई। उसका दिल किसी भी लड़ाई से ज़्यादा तेज़ धड़क रहा था।

अलार्म बजा। उसने झटके से फोन उठाया और बंद कर दिया, ताकि मैं न जागूँ। मेरी पलकें फड़फड़ाईं। मैंने कुछ बुदबुदाया—उसकी कमीज़ में, उसके करीब। उसने हाथ उठाया और मेरे सिर के पीछे रख दिया—हल्का, जैसे मैं काँच की बनी हूँ। वह अब भी हैरान था कि यह सच था। कि मैं यहाँ थी। उसके साथ।

"मम्म... मैंने तो कहा था जल्दी बुलाने को।" मेरी आवाज़ नींद से भरी थी, शिकायत से भरी, लेकिन उसमें कोई गुस्सा नहीं था।

वह धीरे से हँसा। उसकी हँसी उसकी छाती से होती हुई मेरे गाल तक आई। उसकी उंगलियाँ मेरे बालों में उलझे हुए गुच्छों को सहलाने लगीं। उसने मुझे दूर नहीं किया। बस पकड़े रहा। "बुला दिया न अब। अलार्म भी मैंने बंद कर दिया, और अब तुम मुझे छोड़ के नहीं उठ रही हो खुद।"

"उठ रही हूँ न।" मैंने आलस से खिंचाव लिया।

उसने फुस्स की आवाज़ निकाली जब मेरी कोहनी उसके नंगे पेट से लगी। उसने हल्के से मेरी कलाई पकड़ी ताकि मैं और ज़ोर से न दबा दूँ। वह मुझे देखकर मुस्कुराया—सुबह की रोशनी में उसका चेहरा गर्म था। "आराम से, हाँ? अभी तो नहा के निकलना है। इतनी जल्दी क्या है घर के लोगों के सामने?"

"जल्दी काम खत्म करके फिर से सो जाऊँगी मैं।"

वह हँसा। उसने मेरी कलाई छोड़ी और अपने बालों में हाथ फेरा—गन्दे, सोए हुए बालों को पीछे धकेला। वह बेड के किनारे पर आकर बैठ गया। खिंचाव लिया। खामोशी से। "ठीक है, मैं भी जल्दी निपटा दूँगा सब कुछ। चलो, मैं पहले नहा के आता हूँ।"

"जल्दी जाओ।" मैं बैठ गई। उसकी तरफ देखा। "मुझे हेल्प करोगे रसोई में?"

वह तौलिया कंधे पर डालते हुए रुका। पीछे मुड़ा। मुस्कुराया—वह नरम, दुर्लभ मुस्कान जो सिर्फ सुबह की धूप में निकलती है। उसने सिर हिलाया। पहले ही बाथरूम की तरफ बढ़ रहा था। "हाँ, करूँगा। तुम बस रेडी होके आओ। मैं जल्दी हो जाऊँगा। प्रॉमिस।"

"ठीक है।"

मैंने जल्दी से कपड़े बदले। फ्रेश हुई। साड़ी पहनी। वह लाल साड़ी जो मेरी माँ ने दी थी—हाथ का काम, असली जरी। पल्लू ठीक किया। बाल संवारे। आईने में देखा। वह लड़की जो मुझे घूर रही थी, वह मैं थी, लेकिन वह मैं नहीं थी जो कल थी। कुछ बदल गया था।

मैं दरवाज़े पर खड़ी हो गई। बाथरूम से पानी की आवाज़ आ रही थी। मैंने आवाज़ दी—"आपको और कितना टाइम लगेगा?"

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