हलवे की मिठास और एक नई शुरुआत
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हलवा ठंडा हो चुका था। प्लेट के किनारों पर घी जम कर सफेद हो गया था, और मैं उसे चम्मच से खुरच रही थी बिना कुछ सोचे। बस हाथ चल रहे थे। असली काम एकांश ने किया था — गैस पर खड़े होकर, लकड़ी के चम्मच से घी में सूजी को भूनते हुए, तब तक जब तक उसका रंग सुनहरा न हो जाए। मैंने बस पास खड़े होकर देखा था, और फिर जब मम्मी जी ने पूछा कि किसने बनाया, तो मैंने मुस्कुरा कर कह दिया, "हमने मिलके बनाया।"
"हमने मिलके" का मतलब था — मैंने देखा, उसने बनाया।
लेकिन यहाँ कोई फर्क नहीं पड़ता था। उसकी माँ ने हलवा खाया और आँखें बंद कर लीं, जैसे कोई दुआ माँग रही हो। उसके पिता ने दो कटोरी ली और फिर अखबार में मुँह गाड़ लिया। उसके छोटे भाई ने तीन बार और लिया। और मैं बैठी सोच रही थी — यह कैसा घर है जहाँ हर चीज़ इतनी आसानी से मिल जाती है?
"हाँ बिल्कुल, तुमने पूरा रेसिपी मेरे फ़ोन पे देखा था, हाँ।"
एकांश की आवाज़ ने मुझे खींचा। मैंने उसकी तरफ देखा — उसकी आँखों में वह चमक थी, जो मैं पिछले कुछ दिनों में पहचानने लगी थी। शरारत। मगर नरम। उसने मेरी तरफ झुक कर कहा था, ताकि बाकी लोग न सुनें, लेकिन उसकी भाभी ने सुन लिया था और खिलखिला कर हँसी थी।
मैंने उसकी टाँग नीचे से मारी।
"चुप।"
उसके कान गुलाबी हो गए। मुझे यह चीज़ अजीब लगती थी — कितना बड़ा आदमी, तीस के करीब, और कानों से उसकी भावनाएँ पकड़ी जा सकती थीं। उसने होंठ दबाए, हँसी को रोकते हुए, और सिर हिलाया।
"ठीक है, ठीक है। चुप हो गया। पूरा क्रेडिट तुम्हारा है, ओके।"
उसके छोटे भाई ने मौका नहीं छोड़ा। वह आगे झुका, मुँह पर वही मुस्कान जो शैतान लड़कों की होती है — "भाभी जी, आपने सच में बनाया था क्या?"
"हाँ, एसे ही मेरी तारीफ़ करो, मैं तुम्हारी शादी अपनी छोटी बहन से करवा दूँगी।"
मैंने यह इतनी सहजता से कहा कि खुद को भी यकीन नहीं हुआ। उसने चाय पी थी — वह चोक कर गया। उसका चेहरा लाल हो गया, और वह अपनी कुर्सी से उठ खड़ा हुआ, जैसे कोई बच्चा जिसे चिढ़ाया गया हो।
"मैं जा रहा हूँ यहाँ से! तुम दोनों मिलकर मुझे चिढ़ा रहे हो, घर में मेरा कोई रिस्पेक्ट नहीं है।"
वह भाग गया। सच में भाग गया। और मैं हँसी, पहली बार बिना सोचे समझे, बिना मापे कि मेरी हँसी कैसी लग रही है।
एकांश की माँ ने मेरे कंधे को छुआ, जब वह प्लेटें उठा रही थीं। "यह लड़का है न, बस इतना ही ढाक है। तुमने सीधा लाल कर दिया उसको एक ही बात में।"
"अरे मम्मी जी, उसे मेरी छोटी बहन पसंद है कई महीनों से।"
उसकी माँ की आँखें चमक उठीं। वह रुक गईं, हाथ में प्लेटें लिए, और मेरी तरफ देखा जैसे मैंने कोई खज़ाना दिखा दिया हो। "सच? अच्छा तो मैं आज ही तुम्हारे घर फ़ोन करके बात करती हूँ इसके लिए!"
"अरे नहीं नहीं मम्मी जी। आप रुकिए ना। उन्हें डेट तो करने दे पहले। शादी की उम्र थोड़ी हुई है।"
वह रुक गईं। ठहर गईं। और फिर मुस्कुराईं — वह मुस्कान जो समझदार माओं की होती है, जो जानती हैं कि कब आगे बढ़ना है और कब पीछे हटना है। "हाँ, तुम सही बोल रही हो। थोड़ा टाइम है अभी। ठीक है, मैं इंतज़ार कर लूँगी।"
उसने मेरा गाल सहलाया। हल्का। जैसे कोई अपनी बेटी को छूता है।
मेरा गला सूख गया।
"चलो आप आराम कीजिए। दो दिन बाद मेरे और एकांश की रिसेप्शन पर डांस करने के लिए रेडी हो जाइए।"
वह हँसीं, मेरे गाल पर थपकी दी, और प्लेटें ले कर सिंक की तरफ बढ़ गईं। एकांश उनके पीछे खड़ा हुआ था, दरवाज़े के फ्रेम के सहारे, और वह मुझे देख रहा था। उसकी आँखों में वह नरमी थी जो मुझे डराती थी — क्योंकि मैं जानती थी कि वह सच्ची थी।
"सुना आपने पापा जी, मम्मी जी आपको अकेला छोड़ के हमारे साथ डांस करेंगी।"
उसके पिता ने खिड़की के पास से हँसते हुए अखबार उठाया। "अच्छा? तो मैं क्या करूँ अकेले, तुम भी छोड़ दोगी मुझे?"
उसकी माँ ने पल्लू से हाथ पोंछे और उसके पास गईं, उसके कंधे पर हल्का थपका। "अरे तुम तो अपने न्यूज़पेपर के साथ खुश रहते हो, मुझे क्यों चाहिए तुम्हारे पास?"
मैं हँसी। उन्हें देख कर। वह कैसे एक-दूसरे को चिढ़ाते थे, पच्चीस साल बाद भी, जैसे अभी-अभी शादी हुई हो।
एकांश मेरे बगल में आ गया। उसका कंधा मेरे कंधे से लगा, हल्का, जैसे गलती से। लेकिन गलती नहीं थी। वह जानता था कि वह क्या कर रहा है।
"मेरी तो फैमिली हर टाइम ऐसे ही रहती है। कभी बोरिंग नहीं लगता घर में ना?"
"बिल्कुल। वो दोनों कितने खुश लग रहे हैं। काश मेरी फैमिली भी ऐसी होती।"
मैंने यह कहा तो मुझे लगा जैसे मैंने अपना मुँह खुद ही खोल दिया हो। शब्द निकल गए, पहले सोचे बिना। और अब वह हवा में लटक रहे थे, हलवे की मिठास के ऊपर, एक कड़वी परत की तरह।
उसका कंधा अकड़ गया। मेरे खिलाफ। वह मुड़ा, और मुझे देखा — उसकी आँखों में वह समझ थी जो मैंने किसी में नहीं देखी थी। बिना पूछे, बिना जाने, वह जानता था।
"अब यह भी तेरी फैमिली है ना। हम सब है तेरे साथ।"
उसने मेरी बाँह पर हाथ रखा। उसका अंगूठा हल्का-हल्का चल रहा था, ऊपर-नीचे, जैसे कोई घाव को सहला रहा हो।
"पता है। मैं पच्चीस साल गुज़ार दी जिस फैमिली में, उसे तो नहीं भूल सकती ना।"
"मैं समझता हूँ। टाइम लगता है ना सब कुछ अडजस्ट होने में। बस अपने हिसाब से चलो, ओके?"
"अडजस्ट की बात नहीं है। तुम्हारा फैमिली बहुत कूल है।"
मैंने दूसरी तरफ देखा। दीवार पर एक फोटो था — शायद उनकी शादी का। उसकी माँ लाल लहंगे में, उसके पिता शेरवानी में, दोनों हँस रहे थे। उस तस्वीर में मुस्कान बनावटी नहीं थी। मेरे घर की तस्वीरों में कभी ऐसी मुस्कान नहीं थी। हमेशा वही घिसी-पिटी पोज़, वही दिखावटी खुशी।
"सच कहूँ तो मुझे जेलसी फील होता है। पच्चीस साल में हर दिन कोशिश की की मेरे फैमिली को थोड़ी तो चेंज करूँ, लेकिन कुछ नहीं कर सकी। वो लोग तुम्हारे पेरेंट्स की तरह ज़िंदगी जीना नहीं जानते।"
मैंने अपनी साड़ी के किनारे पर लगे धागे को खींचा। वह टूट गया। मैंने उसे उँगलियों से सहलाया।
एकांश ने मुझे अपनी तरफ खींचा। उसकी छाती मेरी पीठ से लगी, हल्का दबाव, जैसे कोई दीवार जो मुझे गिरने से बचा रही हो। उसकी बाँह मेरी कमर पर थी — मजबूत, लेकिन पकड़ा हुआ नहीं। बस टिका हुआ।
"अब तुम यहाँ हो। हर दिन ऐसे ही हँसी-मस्ती में गुज़रेगा। मैं प्रॉमिस करता हूँ।"
उसका मुँह मेरे सिर के ऊपर था। मैं उसकी साँस सुन सकती थी, धीमी, स्थिर। उसने कसम खाई थी — और मुझे यकीन था कि वह निभाएगा। यही सबसे डरावनी बात थी।
मैंने उसकी बगल में चुटकी काटी।
वह चीखा। हल्का। पीछे हटा।
"बहुत इमोशनल हो गया अब। चलो तैयार होते हैं, रिसेप्शन की वेन्यू देखने भी जाना है ना।"
उसने मेरी तरफ देखा। उसकी आँखों में वही चमक थी — लेकिन अब उसमें कुछ और भी था। कुछ नम। कुछ जो उसने नहीं कहा।
उसने कार की चाबियाँ टेबल से उठाईं, और दरवाज़ा खोल दिया। झुक कर। बड़े नाटकीय अंदाज़ में।
"जैसा आपकी आँख का हुक्म, मैडम। चलिए, चलते हैं वेन्यू की तरफ।"
"ऐसे कैसे। मुझे साड़ी तो चेंज करने दो।"
मैं उठी। साड़ी का पल्लू मेरे कंधे से फिसल गया, और मैंने उसे ठीक किया। मैं बेडरूम की तरफ भागी — लेकिन भागने से पहले, मैंने उसकी तरफ देखा।
वह दरवाज़े पर खड़ा था, चाबियाँ हाथ में, और मुझे देख रहा था। उसकी आँखों में वह सब कुछ था जो उसने नहीं कहा था।
मैं भाग गई।
लेकिन मेरे कदम हल्के थे।
पहली बार।
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