टूटती हुई कड़ी — डर, आकर्षण और छल का खेल

रणवीर पूरी रात सो नहीं पाया।

आन्या की बातें, उसकी मुस्कान, उसकी आँखों की गहराई—सब कुछ उसे भीतर कहीं हिला रहा था।

वह सोचता रहा कि आखिर इस लड़की में ऐसा क्या है जो उसकी खोई हुई आयरा की यादें ज़िंदा कर रहा है।

सुबह जब वह ऑफिस पहुँचा, तो पाया कि आन्या पहले से ही वहाँ थी।

वह एक बड़े ग्लास बोर्ड पर कुछ लिख रही थी—उसकी पीठ की ओर से आती हल्की रोशनी उसे और रहस्यमयी बना रही थी।

रणवीर ने अनायास कहा,

“आप हमेशा इतनी जल्दी आती हैं?”

आन्या मुड़ी, उसकी आँखों में शांत आग थी।

“जो लोग बदला लेते हैं, वे कभी देर नहीं करते।”

रणवीर अचानक जम गया।

ये शब्द उसके दिल में तीर की तरह चुभे।

“आप किस बदले की बात कर रही हैं?”

आन्या ने धीमे से मुस्कुराते हुए कहा,

“ओह, प्रोजेक्ट वाला बदला… आप गलत मत समझिए।”

पर रणवीर को लगा कि वह झूठ बोल रही है।

या शायद उसकी मुस्कान ही इतनी खतरनाक थी कि हर बात सच लगती।

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रणवीर का बिखरता संतुलन

दिनभर वह उसके आसपास ही रहा—कभी प्रोजेक्ट के बहाने, कभी सवाल पूछने के बहाने।

वह खुद समझ नहीं पा रहा था कि वह उसे क्यों छोड़ नहीं पा रहा।

एक बार तो उसने उससे कहा,

“आपकी उपस्थिति… मेरे दिमाग़ को उलझा देती है।”

आन्या ने मन ही मन सोचा—

उलझन नहीं… ये पहला कदम है तुम्हारी बर्बादी का।

लेकिन बाहर से उसने नरम स्वर में कहा,

“कभी-कभी दिल उलझ जाए तो दिमाग भी बहकने लगता है, रणवीर।”

रणवीर उसकी गहराई में खो गया—

इतना कि उसे लगा कि वह उससे दूर ही नहीं रह सकता।

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आन्या का अगला जाल

शाम को आन्या जानबूझकर ऑफिस की फाइलें नीचे गिरा देती है।

रणवीर तुरंत उसकी मदद के लिए झुक जाता है।

दोनों के हाथ एक ही फाइल पर टिकते हैं।

एक पल के लिए समय रुक जाता है।

रणवीर की आँखों में अनकही चाहत तैर रही थी।

पर आन्या की आँखों में—

बदले की चमक।

“आन्या…” रणवीर फुसफुसाया,

“आपमें कुछ है… जो मुझे डराता भी है और खींचता भी।”

आन्या ने उसे पास आते हुए देखा, लेकिन पीछे नहीं हटी।

बल्कि उसके कान के पास जाकर धीरे से कहा—

“डर और आकर्षण… दोनों इंसान को अपनी हदें पार करा देते हैं।”

रणवीर की साँसें तेज़ हो गईं।

वह पहली बार इतना खोला हुआ लगा… इतना नाज़ुक।

“मैं… आपकी ओर खिंच रहा हूँ,” उसने स्वीकार किया।

“और मुझे इसका डर लग रहा है।”

आन्या के भीतर एक काली खुशी उठी।

यही वह चाहती थी—रणवीर टूटे, झुके, और उसी के सामने असहाय हो जाए।

“कभी-कभी,” आन्या ने कहा,

“खुद को डर के हवाले कर देना… इंसान को उसके सच के और करीब ले आता है।”

रणवीर ने उसकी आँखों में झाँका—

“और अगर ये सच मुझे तोड़ दे?”

आन्या की मुस्कान ठंडी थी।

“तो टूटने दीजिए, रणवीर। टूटकर ही इंसान अपने पापों का सामना करता है।”

रणवीर का दिल अचानक डूब गया।

उसे लगा वह किसी ऐसी चक्रव्यूह में फँस रहा है जहाँ से निकलना असंभव है।

और उधर, आन्या ने मन ही मन कहा—

“अब शुरुआत तुम्हारे डर की है…

और जल्द ही तुम सच को पहचानोगे—

वह आयरा जिसे तुमने मारा था…

आज तुम्हारे सामने खड़ी हूँ।”

Be continued with us ✍️ ✍️

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