“उसकी जिंदगी कभी उसकी थी ही नहीं”
वो पैदा हुई…
और अचानक पूरे घर में एक अजीब सी खामोशी फैल गई।
जहाँ कुछ देर पहले बच्चे की किलकारी सुनने की बेचैनी थी, वहीं अब सन्नाटा था। किसी के चेहरे पर मुस्कान नहीं थी, किसी ने खुश होकर मिठाई नहीं बाँटी। बस कमरे के बाहर खड़े लोग एक-दूसरे का चेहरा देख रहे थे, जैसे कोई खुशी नहीं बल्कि बोझ घर आ गया हो।
उसकी माँ ने काँपते हाथों से उसे सीने से लगाया। दर्द में भी उसकी आँखों में ममता थी, लेकिन उन आँखों के पीछे एक डर भी छुपा था… क्योंकि वह जानती थी कि इस समाज में लड़की बनकर जन्म लेना आसान नहीं होता।
वो छोटी सी बच्ची इन सब बातों से बिल्कुल अनजान थी।
उसे क्या पता था कि उसने ऐसी दुनिया में आँखें खोली हैं, जहाँ उसके पैदा होते ही लोग उसकी जिंदगी का फैसला करने लगेंगे। जहाँ उसके सपनों से पहले उसकी सीमाएँ तय कर दी जाएँगी।
दादी ने धीरे से कहा,
“कोई बात नहीं… अगली बार बेटा हो जाएगा…”
ये शब्द उस नवजात बच्ची के कानों तक तो नहीं पहुँचे, लेकिन उसकी माँ का दिल जरूर चीर गए। माँ ने अपनी बेटी को और कसकर सीने से लगा लिया, जैसे दुनिया की हर तकलीफ से उसे बचा लेना चाहती हो।
बाहर बारिश हो रही थी। आसमान भी शायद उस बच्ची की किस्मत पर रो रहा था।
वो नन्हीं सी जान बस अपनी छोटी-छोटी आँखें खोलकर इस नई दुनिया को देख रही थी। उसे नहीं पता था कि आगे चलकर लोग उसके हँसने, बोलने, कपड़ों, सपनों और यहाँ तक कि उसके जीने तक पर सवाल उठाएँगे।
उसके छोटे-छोटे हाथ हवा में ऐसे हिल रहे थे जैसे वह इस दुनिया को पकड़ लेना चाहती हो। लेकिन दुनिया ने तो उसके आने से पहले ही उसके लिए नियमों की लंबी सूची तैयार कर रखी थी।
उस रात घर में कोई जश्न नहीं हुआ।
बस एक माँ थी, जो अपनी बेटी के माथे को चूमकर मन ही मन एक ही दुआ माँग रही थी—
“भगवान… मेरी बेटी की जिंदगी मेरी जैसी मत बनाना…”सुबह होते ही घर के लोग अपने-अपने कामों में लग गए, जैसे कुछ हुआ ही न हो। लेकिन उसकी माँ की पूरी दुनिया अब उस नन्हीं सी बच्ची में बस चुकी थी। वह हर पल उसे अपनी बाँहों में छुपाए रखती, क्योंकि उसे डर था इस दुनिया की कठोर सोच कहीं उसकी बेटी की मासूमियत को छीन न ले।
धीरे-धीरे घर में लोग उसे देखने आने लगे। कोई उसके चेहरे को देखकर कहता,
“चेहरा तो ठीक है… बस अगली बार बेटा हो जाए।”
तो कोई हँसते हुए बोल देता,
“अभी से पैसे जोड़ना शुरू कर दो।”
वो छोटी सी बच्ची इन बातों को समझ नहीं सकती थी, लेकिन उसकी माँ हर ताने के साथ अंदर ही अंदर टूटती जा रही थी।
रात को जब सब सो जाते, तब उसकी माँ चुपके से उसे देखती और सोचती—
“क्या मेरी बेटी की जिंदगी भी मेरी तरह समझौतों में गुजर जाएगी?”
माँ उसके छोटे-छोटे हाथों को अपने हाथ में लेकर सपने सजाने लगती। वह चाहती थी उसकी बेटी खुलकर हँसे, अपने सपनों के पीछे भागे, बिना डरे जिंदगी जिए। लेकिन कहीं न कहीं उसे इस समाज की सच्चाई भी पता थी।
उस नन्हीं सी जान को अभी बोलना भी नहीं आता था, लेकिन दुनिया ने उसके लिए फैसले लेने शुरू कर दिए थे।
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