धीरे-धीरे वह बड़ी हो रही थी। अब उसकी मासूम आँखें इस दुनिया को थोड़ा-थोड़ा समझने लगी थीं। उसे महसूस होने लगा था कि यह समाज लड़के और लड़की के लिए एक जैसा नहीं बना। बचपन से ही दोनों के हिस्से अलग-अलग कर दिए जाते हैं। लड़की के हाथों में गुड़िया थमा दी जाती है, उसे रसोई के छोटे-छोटे खिलौनों से खेलना सिखाया जाता है और रात को सोते समय राजकुमार की कहानियाँ सुनाई जाती हैं, मानो उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा सपना किसी “Prince Charming” का इंतज़ार करना ही हो।
वहीं दूसरी तरफ लड़कों को बचपन से मजबूत बनना सिखाया जाता है। उन्हें कहा जाता है कि रोना कमजोरी है, डरना हार है और दुनिया में अपनी पहचान खुद बनानी पड़ती है। उनके सपनों को पंख दिए जाते हैं, जबकि लड़कियों के सपनों को अक्सर जिम्मेदारियों के धागों से बाँध दिया जाता है।
वह यह सब चुपचाप देखती रहती थी। उसे समझ नहीं आता था कि आखिर एक लड़की को हमेशा नाजुक और कमजोर क्यों माना जाता है। क्यों उसके चलने, बोलने, हँसने और जीने तक पर नियम बना दिए जाते हैं। क्यों उसकी जिंदगी पर फैसले लेने का हक हमेशा किसी और के पास होता है।
कभी-कभी वह अपनी गुड़िया को देर तक देखती रहती और सोचती कि शायद समाज लड़कियों को भी उसी गुड़िया की तरह देखता है — सुंदर, शांत और दूसरों की खुशी के लिए जीने वाली। लेकिन उसके अंदर कहीं एक छोटा सा तूफान जन्म ले चुका था। एक ऐसा तूफान जो सवाल करता था, जो समझना चाहता था कि आखिर लड़कियों को सिर्फ सहना ही क्यों सिखाया जाता है।
उसकी उम्र भले छोटी थी, लेकिन दिल अब धीरे-धीरे बड़ा हो रहा था। और उसी दिल में जन्म ले रही थी एक ऐसी खामोश ताकत, जो एक दिन उसकी पहचान बनने वाली थी।समय के साथ उसकी समझ भी बढ़ती जा रही थी। अब वह लोगों की बातों के पीछे छिपे फर्क को महसूस करने लगी थी। जब घर में कोई मेहमान आता, तो लड़कों से पूछा जाता — “बड़े होकर क्या बनोगे?” और लड़कियों से मुस्कुराकर कहा जाता — “इसे तो एक दिन दूसरे घर जाना है।”
ये छोटी-छोटी बातें उसके दिल में कहीं गहराई तक उतर जाती थीं। उसे लगता जैसे लड़कों को बचपन से आसमान दिया जाता है, जबकि लड़कियों को सीमाओं की दीवारें। लड़कों को खुलकर जीना सिखाया जाता है और लड़कियों को हर कदम संभलकर रखना।
वह कई बार छत पर बैठकर आसमान को देर तक देखा करती थी। खुले आसमान में उड़ते पक्षियों को देखकर उसके मन में भी अनगिनत सपने जन्म लेते। वह भी कुछ बनना चाहती थी, अपनी पहचान बनाना चाहती थी। लेकिन हर बार समाज की आवाज उसके सपनों से बड़ी हो जाती — “लड़कियाँ ज्यादा सपने नहीं देखा करतीं।”
धीरे-धीरे उसने महसूस किया कि इस दुनिया में लड़की होना सिर्फ एक पहचान नहीं, बल्कि एक संघर्ष है। एक ऐसा संघर्ष, जो जन्म के साथ ही शुरू हो जाता है। कभी कपड़ों पर रोक, कभी आवाज़ पर रोक, तो कभी सपनों पर।
फिर भी उसके भीतर उम्मीद जिंदा थी। वह जानती थी कि अगर समाज लड़कियों को कमजोर समझता है, तो शायद इसलिए क्योंकि उसने कभी उनकी खामोश ताकत को समझने की कोशिश ही नहीं की। उसकी आँखों में अब मासूमियत के साथ-साथ एक अलग चमक भी थी — खुद को साबित करने की चमक।
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