दहलीज़ के उस पार

वो धीरे-धीरे बड़ी हो रही थी।

इतनी धीरे कि शायद उसे खुद भी एहसास नहीं हुआ कि कब उसके हाथों में खिलौनों की जगह जिम्मेदारियाँ रख दी गईं। बचपन में उसे गुड़िया थमा दी गई, और साथ में यह भी सिखा दिया गया कि “लड़कियाँ घर संभालने के लिए पैदा होती हैं।” छोटी-सी उम्र में ही उसके खेल रसोई तक सीमित कर दिए गए। जब दूसरे बच्चे मिट्टी में भाग रहे होते, वह छोटी प्लेटों में नकली खाना परोसकर “अच्छी बहू” बनने की प्रैक्टिस कर रही होती।

धीरे-धीरे उसने समझना शुरू किया कि उसके लिए दुनिया थोड़ी अलग बनाई गई है।

घर में जब मेहमान आते, तो उसे धीरे बोलने को कहा जाता। जोर से हँसने पर टोक दिया जाता। दौड़ने पर कहा जाता, “लड़कियाँ ऐसे नहीं भागतीं।” उसे समझ नहीं आता था कि आखिर लड़कियों के लिए इतने सारे “ऐसे नहीं” क्यों होते हैं।

क्यों उसके भाई के शोर को बचपना कहा जाता था और उसकी आवाज़ को बदतमीज़ी?

फिर एक दिन वह स्कूल जाने लगी।

उसकी छोटी-सी पीठ पर बस्ता था, आँखों में सपने थे, लेकिन उन सपनों से पहले उसे हिदायतों का बोझ पकड़ा दिया गया।

“सड़क पर ज्यादा हँसना मत।”

“गर्दन झुकाकर चलना।”

“किसी लड़के से ज्यादा बात मत करना।”

“कोई कुछ कहे तो जवाब मत देना।”

“घर की इज्जत तुम्हारे हाथ में है।”

वह हर रोज स्कूल जाती, लेकिन पढ़ाई से ज्यादा उसे अपने अस्तित्व को संभालना सिखाया जा रहा था। वह रास्ते भर खुद को समेटकर चलती, जैसे उसका खुलकर जी लेना कोई गलती हो। उसने धीरे-धीरे अपनी हँसी को धीमा कर लिया, अपने सवालों को मन में दबा लिया, और अपनी आँखों के सपनों को छोटा करना सीख लिया।

कई बार रास्ते में कुछ लड़के उसका मजाक उड़ाते, फब्तियाँ कसते, पीछे मुड़कर देखते। वह डर जाती, लेकिन घर आकर कुछ नहीं कहती। क्योंकि उसे पहले ही सिखा दिया गया था — “चुप रहना ही समझदारी है।”

वह सोचती, गलती उसकी नहीं है, फिर भी डर उसे ही क्यों लगता है?

धीरे-धीरे उसने महसूस किया कि इस दुनिया में लड़की होना सिर्फ एक पहचान नहीं, बल्कि हर दिन खुद को बचाकर जीने की एक लड़ाई है।

उसके कपड़ों पर नजर रखी जाती, उसकी आवाज़ पर पहरा होता, उसके दोस्तों पर सवाल उठते।

उसे हमेशा यह एहसास दिलाया जाता कि अगर कुछ गलत हुआ, तो उंगली सबसे पहले उसी पर उठेगी।

फिर भी, वह हर सुबह उठती।

अपने बाल बनाती।

किताबें उठाती।

और फिर से बाहर की दुनिया का सामना करने निकल जाती।

क्योंकि उसके अंदर कहीं एक छोटी-सी उम्मीद अब भी जिंदा थी।

उम्मीद कि शायद एक दिन उसे सिर्फ “लड़की” नहीं, “इंसान” समझा जाएगा।

शायद एक दिन उसे चलते वक्त गर्दन झुकानी नहीं पड़ेगी।

शायद एक दिन उसकी हँसी किसी की इज्जत से नहीं जोड़ी जाएगी।

शायद एक दिन उसे डर और संस्कार के बीच चुनना नहीं पड़ेगा।

लेकिन उस उम्मीद तक पहुँचने का रास्ता आसान नहीं था।

समाज ने उसे बचपन से ही त्याग सिखाया था।

अपने हिस्से की खुशी छोड़ना सिखाया था।

अपनी आवाज़ दबाना सिखाया था।

यहाँ तक कि कई बार उसे खुद से भी माफी माँगनी पड़ती थी, सिर्फ इसलिए क्योंकि वह खुलकर जीना चाहती थी।

और सबसे दुख की बात यह थी कि यह सब उसे प्यार के नाम पर सिखाया गया।

हर रोक को “तुम्हारी भलाई” कहा गया।

हर डर को “संस्कार” का नाम दिया गया।

वह लड़की अब बड़ी हो रही थी।

लेकिन उसके अंदर का बचपन धीरे-धीरे कहीं खोता जा रहा था।

वह अब पहले की तरह खुलकर नहीं हँसती थी।

किसी नए इंसान से बात करने से पहले डरती थी।

रास्तों पर चलते हुए बार-बार पीछे मुड़कर देखती थी।

और हर रात सोने से पहले यही सोचती थी कि आखिर एक लड़की को हर कदम पर खुद को साबित क्यों करना पड़ता है?

फिर भी, उसके भीतर कहीं एक आग बाकी थी।

एक छोटी-सी जिद कि वह सिर्फ डरकर नहीं जिएगी।

वह पढ़ेगी। आगे बढ़ेगी। अपने सपनों को मारेगी नहीं।

क्योंकि उसने देख लिया था कि समाज लड़कियों को कमजोर बनाकर रखना चाहता है, ताकि वे सवाल न पूछें।

लेकिन शायद वही सवाल एक दिन बदलाव बनेंगे।

और उस दिन, कोई छोटी लड़की सड़क पर खुलकर हँसेगी…

बिना डरे।

बिना झुकी गर्दन के।

बिना इस डर के कि दुनिया उसकी आज़ादी को गलत समझ लेगी।

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