लेकिन धीरे-धीरे उसे महसूस होने लगा कि यहाँ उसकी खुशी से ज़्यादा महत्व नियमों का है।
उसे बताया गया कि सुबह कितने बजे उठना है, कैसे कपड़े पहनने हैं, किससे कितनी देर बात करनी है, कितना हँसना है, कैसे बैठना है, कब खाना है। यहाँ तक कि उसकी नींद भी अब उसकी अपनी नहीं रही थी। मायके में वह कभी देर तक किताब पढ़ती रहती थी, कभी माँ के पास बैठकर बातें करती थी, कभी बिना किसी डर के जोर से हँसती थी। लेकिन यहाँ उसे हर पल यह एहसास कराया जाता कि वह “पराई” है और उसे हर कदम सोच-समझकर रखना होगा।
धीरे-धीरे उसने खुद को बदलना शुरू कर दिया। उसने अपनी पसंद दबा दी, अपने शौक पीछे छोड़ दिए, अपनी आदतें बदल दीं। क्योंकि उसे लगा शायद यही एक अच्छी बहू होने की पहचान है।
लेकिन इंसान कितना बदल सकता है?
एक दिन उसके पीरियड्स आए। वह पहले से ही दर्द में थी, शरीर थका हुआ था, मन परेशान था। लेकिन उस घर में उसके दर्द को समझने के बजाय उसे एक अलग कमरे में भेज दिया गया। उसे कहा गया कि वह रसोई में नहीं जाएगी, किसी चीज़ को हाथ नहीं लगाएगी, सबसे दूर रहेगी।
उस रात वह अकेली कमरे में बैठी बहुत देर तक छत को देखती रही। उसके मन में एक ही सवाल घूम रहा था—
“क्या एक लड़की का शरीर अपवित्र है? क्या दर्द में होने के बावजूद उसे इंसान की तरह सम्मान नहीं मिल सकता?”
उसे अपनी माँ याद आई। मायके में जब उसे दर्द होता था, माँ उसके सिर पर हाथ फेरती थी, गर्म पानी देती थी, पूछती थी “बहुत दर्द हो रहा है क्या?” लेकिन यहाँ किसी ने यह तक नहीं पूछा कि वह ठीक है या नहीं।
उस दिन उसे पहली बार एहसास हुआ कि कुछ लोग बहू को इंसान नहीं, सिर्फ जिम्मेदारियों का बोझ समझते हैं।
उसका पति भी कभी उसके साथ खड़ा नहीं हुआ। उसने सोचा था कि कम से कम जीवनसाथी उसे समझेगा। लेकिन वह आदमी, जिसके साथ उसने पूरी जिंदगी बिताने का सपना देखा था, वही उसकी खामोशी का सबसे बड़ा कारण बन गया।
जब घर में कोई उसे गलत बोलता, वह चुप रहता। जब उसकी बेइज्जती होती, वह नजरें फेर लेता। जब वह रोती, तो उसे समझाने के बजाय यही कहता—
“हर लड़की को ससुराल में एडजस्ट करना पड़ता है।”
लेकिन कोई यह क्यों नहीं समझता कि एडजस्ट करना और खुद को खो देना दो अलग बातें हैं।
धीरे-धीरे उसने बोलना कम कर दिया। क्योंकि हर बार जब वह अपनी बात कहती, उसे चुप करा दिया जाता।
“बहुओं को ज्यादा जवाब नहीं देना चाहिए।”
“इतना बोलना अच्छी बात नहीं।”
“अपने घर के तरीके भूल जाओ।”
वह सोचती थी, अगर शादी के बाद लड़की को अपने सारे तरीके, अपनी आदतें, अपनी पहचान ही भूलनी पड़े, तो फिर बचता क्या है उसके पास?
उसका कमरा लोगों से भरा होता था, लेकिन उसका मन हमेशा अकेला रहता था।
कभी-कभी रात को सबके सो जाने के बाद वह चुपचाप रोती थी। तकिए में मुँह छुपाकर, ताकि उसकी आवाज़ किसी को सुनाई न दे। क्योंकि उसे पता था कि अगर किसी ने देख लिया, तो उसके आँसुओं को भी “ड्रामा” कह दिया जाएगा।
उसने कई बार खुद को समझाया—
“शायद गलती मेरी ही होगी।”
“शायद मैं अच्छी बहू नहीं बन पा रही।”
यही सबसे दर्दनाक बात होती है। जब एक लड़की दूसरों की गलतियों के लिए खुद को दोष देने लगती है।
वह अंदर ही अंदर टूट रही थी।
उसकी हँसी अब पहले जैसी नहीं रही थी। उसकी आँखों की चमक धीरे-धीरे खत्म हो रही थी। वह वही लड़की थी जो कभी छोटी-छोटी बातों पर खिलखिलाकर हँसती थी, जो अपने सपनों के बारे में घंटों बात करती थी। लेकिन अब वह सिर्फ काम करती थी, सुनती थी, और चुप रहती थी।
समाज अक्सर कहता है कि लड़कियाँ शादी के बाद “घर बसा लेती हैं।”
लेकिन कोई यह नहीं देखता कि उस घर को बसाने के लिए लड़की अपने अंदर कितना कुछ उजाड़ देती है।
वह हर दिन खुद को समझाने की कोशिश करती रही। उसने हर रिश्ते को दिल से निभाया। उसने कभी किसी से ऊँची आवाज़ में बात नहीं की, कभी किसी का बुरा नहीं चाहा। लेकिन फिर भी उसे सम्मान नहीं मिला।
क्योंकि कुछ लोगों के लिए बहू चाहे कितनी भी अच्छी क्यों न हो, वह कभी बेटी नहीं बन सकती।
सबसे ज्यादा दर्द उसे तब होता था जब लोग कहते—
“तुम्हें किस बात की कमी है?”
क्योंकि हर कमी पैसों की नहीं होती।
कुछ कमियाँ सम्मान की होती हैं।
कुछ प्यार की होती हैं।
कुछ अपनापन न मिलने की होती हैं।
और ये कमियाँ इंसान को अंदर से खोखला कर देती हैं।
वह कई बार आईने के सामने खुद को देखती और सोचती—
“क्या मैं वही लड़की हूँ जो कभी इतनी खुश रहती थी?”
उसे लगता जैसे उसकी जिंदगी अब उसकी अपनी रही ही नहीं।
एक लड़की जब अपना घर छोड़ती है, तो सिर्फ पता नहीं बदलता, उसकी पूरी दुनिया बदल जाती है। उसे हर दिन खुद को साबित करना पड़ता है। हर दिन यह डर रहता है कि कहीं उससे कोई गलती न हो जाए।
और सबसे दुख की बात यह है कि समाज ने इसे “सामान्य” मान लिया है।
लोग कहते हैं—
“ससुराल में थोड़ा सहना पड़ता है।”
लेकिन आखिर कब तक?
क्यों हमेशा सहने की जिम्मेदारी सिर्फ लड़की पर होती है?
क्यों उसे ही हर बार चुप रहने की सलाह दी जाती है?
उसने महसूस किया कि कई बार औरतें ही औरतों का दर्द नहीं समझतीं। जो खुद कभी इसी दर्द से गुजरी थीं, वही आज किसी दूसरी लड़की से वही सहने की उम्मीद करती हैं।
लेकिन दर्द समय के साथ कम नहीं होता।
दर्द बस इंसान को चुप रहना सिखा देता है।
एक दिन उसने अपनी माँ से फोन पर बात की। माँ ने सिर्फ उसकी आवाज़ सुनकर पूछ लिया—
“तू ठीक है ना?”
और वह रो पड़ी।
क्योंकि दुनिया चाहे कुछ भी कहे, एक माँ अपनी बेटी की खामोशी भी समझ जाती है।
उसने पहली बार महसूस किया कि वह कितनी थक चुकी है। दूसरों को खुश करते-करते, खुद को बदलते-बदलते, हर दिन अपनी भावनाओं को दबाते-दबाते।
लेकिन उसके अंदर कहीं न कहीं एक छोटी सी उम्मीद अभी भी जिंदा थी।
उम्मीद कि एक दिन लोग समझेंगे कि बहू भी इंसान होती है।
उम्मीद कि एक दिन लड़कियों को सिर्फ जिम्मेदारी नहीं, सम्मान भी मिलेगा।
उम्मीद कि एक दिन किसी लड़की को अपने ही घर में डरकर नहीं जीना पड़ेगा।
क्योंकि एक लड़की सिर्फ “बहू” नहीं होती।
वह भी किसी की बेटी होती है।
उसके भी सपने होते हैं।
उसके भी जज़्बात होते हैं।
उसे भी दर्द होता है।
और सबसे जरूरी बात—
उसे भी सम्मान के साथ जीने का पूरा अधिकार है।
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