सुबह की हल्की धूप पुराने महल जैसे ठिकाने की खिड़कियों से भीतर आ रही थी।
लेकिन उस कमरे में गर्मी का असली कारण सूरज नहीं था—
वह था रायान, और उसकी बगल में खड़ी ज़ारा, जो अब उसके इतने करीब थी कि आँसुओं, डर और खिंचाव—सबके बीच एक नई चाहत जन्म ले चुकी थी।
रात की खामोशी उनके बीच जो अनकहा छोड़ गई थी,
वह सुबह एक और तीव्रता के साथ लौट आई।
ज़ारा धीरे-धीरे आँखें खोलकर खिड़की की ओर बढ़ी।
रायान उसके पीछे खड़ा हो चुका था—
इतना करीब कि उसकी गर्म साँसें उसके गले के पास हल्की-सी गुदगुदाहट भेज रही थीं।
“रात ठीक गुज़री?”
उसकी आवाज़ भारी, धीमी और बेहद मुलायम थी।
ज़ारा ने जवाब देने से पहले अपनी धड़कनों को संभाला।
“तुम्हारे पास… रातें अलग होती हैं।”
रायान ने हल्की-सी मुस्कुराहट के साथ उसकी कमर के पास अपनी उँगलियाँ रोकीं—
छुआ नहीं, बस महसूस होने जितनी करीब।
यह नज़दीकी किसी भी शब्द से ज़्यादा तेज़ थी।
“तुम्हारे अंदर कुछ है, ज़ारा…
कुछ ऐसा जो मुझे अपनी ओर खींचता जा रहा है।
और मुझे ये खिंचाव डराता भी है… और बाँधता भी।”
ज़ारा उसकी ओर मुड़ी।
उसकी आँखों में एक ऐसा विश्वास था जिसे देखकर रायान का कठोर दिल पहली बार खुद से लड़ने लगा।
“कभी-कभी खिंचाव… किसी वजह से होता है,”
ज़ारा ने धीरे से कहा।
“शायद तुम खुद को जितना अंधेरा समझते हो… उतने नहीं हो।”
रायान उसके चेहरे को हल्के से थाम लेता है।
उसका स्पर्श गर्म, भारी और दिल तक उतर जाने वाला था।
ज़ारा ने अपनी पलकों को झुका लिया—जैसे उसके छूने से पूरी दुनिया शांत हो जाए।
“मेरे करीब मत आओ, ज़ारा,”
वह धीरे से फुसफुसाया।
“क्योंकि जितना करीब आओगी… उतना तुमसे दूर जाना मेरे लिए नामुमकिन हो जाएगा।”
ज़ारा उसकी उँगलियों में अपनी उँगलियाँ पिरो देती है।
“तो दूर जाने की कोशिश ही मत करो।”
उनके बीच की हवा अचानक सुलग उठी।
रायान ने उसे और करीब खींचा—इतना कि उनके बीच कोई फ़ासला बाकी नहीं रहा,
सिर्फ़ धड़कनों का शोर।
उसने ज़ारा का माथा छुआ—
एक स्पर्श जो वासना नहीं,
बल्कि एक गहरी, खूबसूरत चाहत था।
“तुम्हारी आँखें…”
रायान ने उसकी आँखों में झांकते हुए कहा,
“मुझे पिघला देती हैं।”
ज़ारा मुस्कुरा दी—धीमी, कोमल, उसके दिल को छू लेने वाली।
“और तुम… जितना खुद को ख़तरनाक दिखाते हो,
उतने हो नहीं।”
रायान ने उसके बालों को धीरे से पीछे किया।
उसका चेहरा ज़ारा के इतने करीब था कि दोनों की साँसें एक-दूसरे में घुल रही थीं।
“तुम नहीं जानती, ज़ारा,”
उसकी आवाज़ और भारी हो गई।
“मैं किस हद तक अंधेरा हूँ।
तुम मेरे करीब रहोगी तो इस अंधेरे में खो भी सकती हो।”
ज़ारा की उँगलियाँ उसकी जॉलाइन पर फिसलती हैं—
धीरे, नरमी से, जैसे किसी को टूटने से बचाने के लिए छुआ जाता है।
“शायद… मैं खोना चाहती हूँ,”
ज़ारा ने फुसफुसाया।
“तुम्हारी इस दुनिया में—बस तुम्हारे साथ।”
रायान पहली बार भीतर से काँपा।
ज़ारा के शब्द उसकी दीवारों को तोड़ रहे थे।
वह उसे अपनी बाँहों में भर लेता है—
मजबूती से, धीरे से, पूरी चाहत के साथ।
उनका आलिंगन तीव्र था,
नर्म था,
खतरनाक था…
और बेहद रोमांटिक।
उस पल, रायान ने महसूस किया—
उसकी दुनिया का अंधेरा अब अकेला नहीं रहा।
ज़ारा उसमें रोशनी बनकर उतर चुकी थी।
और दोनों जानते थे—
अब लौटने का कोई रास्ता नहीं बचा।
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