Haunted Hotel ( Hindi )
पुराने पहाड़ी रास्ते के किनारे एक बंद पड़ा गेस्टहाउस था—“शांतिनिकेतन लॉज।” लोग कहते थे, वहाँ रात बिताने वाला कभी सुबह वैसा नहीं लौटता जैसा गया था।
एक बरसाती शाम, पाँच दोस्त रास्ता भटककर उसी लॉज में पहुँच गए। अंदर एक बूढ़ा चौकीदार मिला, जिसकी आँखें अजीब खाली थीं। उसने सिर्फ इतना कहा,
“कमरा नंबर 7 मत खोलना… चाहे अंदर से कोई भी आवाज़ आए।”
रात गहराई। बिजली चली गई। अचानक ऊपर वाली मंज़िल से किसी लड़की के रोने की आवाज़ आने लगी। पहले धीमी… फिर चीखों में बदलती हुई।
एक दोस्त डरते हुए बोला, “वहाँ कोई फँसा है!”
बाकियों ने रोका, पर जिज्ञासा जीत गई। वे सब टॉर्च लेकर ऊपर पहुँचे।
कमरा नंबर 7 का दरवाज़ा आधा खुला था।
अंदर दीवारों पर नाखूनों के निशान थे। बीच में टूटा हुआ पलंग, और उस पर एक पुरानी डायरी। जैसे ही डायरी खोली, उसमें आखिरी लाइन लिखी थी—
“अगर तुम यह पढ़ रहे हो, तो वह अब तुम्हारे पीछे खड़ी है…”
टॉर्च झपकने लगी।
सबने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा—
दरवाज़े के पास एक औरत खड़ी थी, भीगे बाल चेहरे पर चिपके हुए, पैर उल्टे मुड़े हुए।
एक दोस्त चीखा और भागा, लेकिन सीढ़ियों से नीचे गिर पड़ा। नीचे पहुँचे तो चौकीदार गायब था… और मुख्य दरवाज़ा बाहर से बंद।
तभी लॉज के हर कमरे से एक साथ दरवाज़े खुलने की आवाज़ आई।
कमरा नंबर 7 की औरत अब नीचे हॉल में थी—और उसके हाथ में वही डायरी थी, जिसमें अब नई लाइन उभर रही थी:
“छह लोग आए थे…
अब सिर्फ एक बचेगा।”
सुबह पुलिस पहुँची। लॉज खाली था।
बस हॉल में एक नई तस्वीर मिली—दीवार पर टंगी।
उस तस्वीर में पाँच दोस्त खड़े थे…
और उनके पीछे छठी आकृति मुस्कुरा रही थी।
वह एकमात्र बचा हुआ लड़का सुबह जंगल के किनारे बेहोश मिला। जब उसे होश आया, उसे पिछली रात की कोई साफ याद नहीं थी—सिर्फ टूटे-फूटे दृश्य: चीखें, अंधेरा, और वह उल्टे पैरों वाली औरत।
पुलिस ने उससे बार-बार पूछा, “बाकी चार कहाँ हैं?”
लेकिन उसके पास कोई जवाब नहीं था।
कुछ दिनों बाद वह अपने घर लौट आया। शुरुआत में सब सामान्य लगा… मगर पहली ही रात उसने अपने कमरे की खिड़की पर हल्की दस्तक सुनी।
टक… टक… टक…
जब उसने परदा हटाया, बाहर तीसरी मंज़िल की ऊँचाई पर वही औरत खिड़की के बाहर चिपकी खड़ी थी।
अगली सुबह खिड़की पर मिट्टी से लिखा था—
“तुम बचकर नहीं निकले… तुम बस चुने गए हो।”
धीरे-धीरे उसके साथ अजीब घटनाएँ होने लगीं। हर रात ठीक 2:17 बजे घर की सारी घड़ियाँ बंद हो जातीं। उसके फोन में अपने-आप तस्वीरें आ जातीं—अंधेरे कमरों की, जिनमें पीछे वही आकृति दिखती।
एक रात उसने तय किया कि वह सच जाने बिना नहीं रहेगा। उसने डायरी फिर खोली, जो रहस्यमय तरीके से उसके बैग में मिल गई थी।
आखिरी पन्ने पर लिखा था:
“जो एक बचता है, वही अगला चौकीदार बनता है।”
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई।
दरवाज़ा खोला—बाहर कोई नहीं था।
लेकिन ज़मीन पर पड़ा था “शांतिनिकेतन लॉज” का वही पुराना चौकीदार वाला लालटेन।
और उसके पीछे दीवार पर एक परछाईं उभरी—
इस बार वह औरत नहीं…
बल्कि उसकी अपनी परछाईं थी,
जिसकी आँखें अब इंसानी नहीं रहीं।
अगली सुबह वह लड़का गायब था।
कुछ महीनों बाद, एक नया यात्री बारिश से बचने उसी लॉज में पहुँचा।
दरवाज़ा खोला एक नए चौकीदार ने…
उसकी आँखें खाली थीं।
चेहरा पहचाना सा था।
वह वही आखिरी बचा हुआ लड़का था.
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