episode 2

बरसों से बंद कमरा नंबर 7 के बारे में एक ही बात मशहूर थी—जो भी उसके अंदर गया, वापस नहीं लौटा… या लौटा तो इंसान नहीं रहा।

एक तूफानी रात, लॉज में एक अजनबी लड़की पहुँची। उसके हाथ में पुराना नक्शा था और आँखों में डर से ज्यादा जिद। उसने सीधे नए चौकीदार से कहा,

“मुझे कमरा नंबर 7 खोलना है।”

चौकीदार के चेहरे पर पल भर के लिए डर उभरा, फिर वह धीमे बोला,

“अगर दरवाज़ा खुल गया… तो जो बंद है, वह फिर कभी बंद नहीं होगा।”

लेकिन लड़की नहीं रुकी।

आधी रात को उसने जंग लगा ताला तोड़ा। दरवाज़ा चरमराया… और अंदर से बर्फ जैसी ठंडी हवा निकली। कमरा पहले से बड़ा लग रहा था—जैसे वह कमरा नहीं, कोई अंतहीन गलियारा हो।

दीवारों पर सैकड़ों तस्वीरें टंगी थीं—हर तस्वीर में वही लोग, जो सालों से लापता घोषित थे।

कमरे के बीचोंबीच एक लोहे का संदूक रखा था, जिस पर खून जैसे अक्षरों में लिखा था:

“मत खोलो। सपना जाग जाएगा।”

जैसे ही उसने संदूक छुआ, पीछे से दरवाज़ा बंद हो गया।

कमरे में अचानक बच्चों की हँसी गूँजने लगी… फिर रोने की आवाज़ें… फिर एक साथ कई फुसफुसाहटें:

“हमें बाहर जाने दो…”

काँपते हाथों से उसने संदूक खोला।

अंदर कोई चीज़ नहीं थी—सिर्फ एक टूटा हुआ आईना।

लेकिन आईने में उसका चेहरा नहीं दिख रहा था।

उसमें दिख रही थी वही उल्टे पैरों वाली औरत…

और उसके पीछे खड़ा था लॉज का पहला मालिक, जिसकी मौत 70 साल पहले हो चुकी थी।

आईने से आवाज़ आई:

“यह लॉज लोगों को नहीं निगलता… यह उनके डर को कैद करता है।

और अब… तुम्हारा डर सबसे मजबूत है।”

अचानक दीवारों की सारी तस्वीरों की आँखें हिलने लगीं।

लड़की भागकर बाहर निकली, लेकिन लॉज बदल चुका था—अब वहाँ कोई दरवाज़ा नहीं, कोई सीढ़ी नहीं, सिर्फ अंतहीन अंधेरा गलियारा था।

सुबह गाँव वालों ने देखा—पुराना लॉज पूरी तरह जल चुका था।

राख में सिर्फ एक चीज़ बची थी—

वही टूटा आईना।

और अब उसमें एक नई तस्वीर थी…

उस लड़की की।

लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी—

आईने में उसके पीछे कोई खड़ा था,

जो धीरे-धीरे बाहर निकल रहा था…

सालों पहले, जब “शांतिनिकेतन लॉज” नया-नया बना था, वहाँ एक महिला रहती थी—लॉज के मालिक की पत्नी। गाँव वाले उसे “माया” कहते थे।

माया साधारण औरत नहीं थी। कहा जाता था कि उसे लोगों के सपनों में चलने की शक्ति थी। वह रात में सोते लोगों के डर देख सकती थी—और चाहती तो उन्हें सच भी कर सकती थी।

शुरू में उसने इस शक्ति का इस्तेमाल लोगों की मदद के लिए किया।

लेकिन एक रात लॉज में भयानक आग लगी। उस आग में उसका छोटा बेटा कमरा नंबर 7 में फँस गया।

माया ने उसे बचाने की कोशिश की, मगर मालिक ने दरवाज़ा बाहर से बंद कर दिया—क्योंकि उसे डर था कि माया की शक्तियाँ सबको नष्ट कर देंगी।

अपने बेटे को जलते देख माया का मन टूट गया।

मरने से पहले उसने श्राप दिया:

“जिसने मेरे बच्चे की चीखें अनसुनी कीं, उनका डर अब कभी नहीं सोएगा।”

उसकी आत्मा उसी रात कमरा नंबर 7 में बंध गई।

लेकिन वह उल्टे पैरों वाली औरत कैसे बनी?

क्योंकि जब आग में वह गिरी, उसका शरीर जलकर मुड़ गया था—और उसकी आत्मा उसी विकृत रूप में कैद रह गई।

टूटा आईना असल में उसकी कैद था।

हर बार कोई उसे खोलता, माया अपने साथ एक नया डर, एक नई आत्मा कैद कर लेती।

जो लड़की तीसरे भाग में आई थी—वह कोई साधारण यात्री नहीं थी।

वह माया की अपनी वंशज थी… उसकी परपोती।

उसे लॉज खत्म करने भेजा गया था।

आखिरी रात, वह फिर आईने के सामने खड़ी हुई और बोली:

“मैं तुम्हें मुक्त करने आई हूँ।”

आईने में माया पहली बार रोई।

जैसे ही लड़की ने आईना तोड़ा, पूरा लॉज काँप उठा। दीवारों पर कैद सारी आत्माएँ चीखते हुए बाहर निकल गईं।

माया की आकृति धीरे-धीरे शांत होने लगी… उसका विकृत चेहरा सामान्य हो गया।

गायब होने से पहले उसने कहा:

“अब कोई सपना नहीं जागेगा…”

सुबह, जहाँ लॉज था, वहाँ सिर्फ खाली ज़मीन थी।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

कुछ महीनों बाद, उसी जगह एक नया होटल बना।

पहले ही दिन, कमरा नंबर 7 की दीवार पर किसी ने अंदर से लिख दिया—

“माँ… मैं अभी भी यहाँ हूँ।”

और नीचे छोटे-छोटे जले हुए पैरों के निशान थे।

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