नए होटल का नाम था “सिल्वर पाइन रेसिडेंसी।” मालिकों ने पुरानी ज़मीन का इतिहास छिपा दिया था, ताकि कोई डरकर बुकिंग रद्द न करे।
पहली ही रात कमरा नंबर 7 में एक परिवार ठहरा—माँ, पिता, और उनका आठ साल का बेटा, आरव।
रात ठीक 2:17 बजे आरव की आँख खुली।
उसने देखा—कमरे की दीवार पर काले धुएँ जैसे निशान बन रहे हैं… धीरे-धीरे वे छोटे पैरों के जले हुए निशानों में बदल गए, जो बिस्तर के नीचे जाकर रुक गए।
आरव ने नीचे झाँका।
अंधेरे में दो चमकती आँखें उसे घूर रही थीं।
एक पतली, जली हुई आवाज़ आई—
“क्या तुम मेरी माँ को देखे हो…?”
आरव डर के मारे चीख पड़ा। उसके माता-पिता जागे, लाइट जलाई—पर नीचे कुछ नहीं था।
सुबह उन्होंने होटल छोड़ना चाहा, मगर रिसेप्शन पर पता चला—मुख्य दरवाज़ा बाहर से बंद था, और होटल का कोई स्टाफ मौजूद नहीं था।
फोन काम नहीं कर रहे थे।
धीरे-धीरे बाकी मेहमानों ने भी शिकायत की—हर किसी ने रात में एक छोटे बच्चे की आवाज़ सुनी थी।
होटल के सीसीटीवी फुटेज में दिखा—रात 2:17 पर सारे गलियारों में एक जला हुआ बच्चा घूम रहा था, हर दरवाज़े पर रुककर एक ही बात कह रहा था:
“माँ… दरवाज़ा खोलो…”
आरव ने हिम्मत करके उस बच्चे का पीछा किया। वह उसे होटल के बंद बेसमेंट तक ले गया—जहाँ पुरानी राख के नीचे एक छुपा हुआ लोहे का दरवाज़ा था।
दरवाज़े पर वही शब्द खुदे थे:
“कमरा नंबर 7 कभी खत्म नहीं होता।”
जैसे ही दरवाज़ा खुला, अंदर वही पुराना जला हुआ कमरा दिखाई दिया—लेकिन इस बार बीच में एक बच्चा बैठा था।
वह माया का बेटा था।
उसने धीरे से सिर उठाया।
उसका आधा चेहरा राख में बदल चुका था, लेकिन आँखों में आँसू थे।
“माँ चली गई…
पर मुझे कोई लेने नहीं आया…”
अचानक पीछे से होटल की सारी दीवारें काँपने लगीं।
स्पीकर अपने-आप चालू हो गए, और हर कमरे में एक साथ आवाज़ गूँजी:
“अब जो अंदर आया है… वही यहीं रहेगा।”
दरवाज़ा बंद होने लगा।
आरव और उसका परिवार बाहर भागने लगे—लेकिन आखिरी पल में आरव ने देखा:
उस बच्चे ने उसका हाथ पकड़ लिया था।
और उसके हाथ पर जलने का निशान उभर आया…
सुबह होटल खाली मिला।
सिर्फ कमरा नंबर 7 खुला था।
बिस्तर पर राख से लिखा था—
“अब मेरा नया दोस्त है।”
आरव को सबने सुरक्षित समझा—क्योंकि अगली सुबह वह होटल के बाहर सड़क किनारे अकेला बैठा मिला। वह ज़िंदा था, पर बिल्कुल चुप।
उसकी माँ ने उसे गले लगाया, पिता रो पड़े, मगर आरव की आँखों में अजीब खालीपन था—जैसे वह अभी भी कहीं और अटका हो।
घर लौटने के बाद सब बदलने लगा।
पहली रात, आरव ने अपने कमरे की दीवार पर उँगली से राख जैसी रेखाएँ बनानी शुरू कर दीं।
सुबह देखा गया—दीवार पर एक नक्शा बना था।
वह नक्शा उसी पुराने लॉज के तहखाने का था…
और बीच में लाल घेरे में लिखा था:
“वह अभी भी नीचे है।”
आरव ने बोलना बंद कर दिया, लेकिन हर रात नींद में एक ही वाक्य दोहराता:
“उसे बाहर मत आने देना…”
तीसरी रात 2:17 बजे घर की बिजली चली गई।
माँ ने देखा—आरव बिस्तर पर नहीं था।
उसके कमरे की खिड़की खुली थी, और बाहर मिट्टी में छोटे जले हुए पैरों के निशान सड़क की ओर जा रहे थे।
पूरा परिवार उन निशानों के पीछे-पीछे चला…
और वे निशान सीधे वापस उसी ज़मीन तक पहुँचे, जहाँ सिल्वर पाइन रेसिडेंसी खड़ा था।
लेकिन होटल अब वहाँ नहीं था।
उसकी जगह सिर्फ धुंध से घिरा जला हुआ ढांचा खड़ा था—पुराना शांतिनिकेतन लॉज।
अंदर से आरव की आवाज़ आई:
“माँ… जल्दी आओ…”
माँ भागकर अंदर गईं। हॉल के बीचोंबीच आरव खड़ा था—पर उसके पीछे वही जला हुआ बच्चा भी खड़ा था, इस बार मुस्कुराते हुए।
उसने कहा:
“अब मैं अकेला नहीं हूँ।
उसने मेरा डर बाँट लिया है।”
तभी फ़र्श फटने लगा।
नीचे एक गहरा अँधेरा गड्ढा खुला, जिसमें अनगिनत हाथ ऊपर उठ रहे थे।
आरव की माँ ने उसे खींचने की कोशिश की—लेकिन उसका हाथ बर्फ जैसा ठंडा था… और धीरे-धीरे राख में बदल रहा था।
आरव ने पहली बार साफ आवाज़ में कहा:
“अगर मैं गया… दरवाज़ा बंद हो जाएगा।”
माँ रोते हुए चिल्लाईं:
“नहीं!”
लेकिन तभी जला हुआ बच्चा पीछे हट गया… जैसे किसी ने उसे पुकारा हो।
ऊपर टूटी छत से एक परिचित स्त्री आवाज़ गूँजी—
“उसे छोड़ दो…”
धुएँ में माया की आकृति फिर दिखाई दी।
क्या माया वापस अपने बेटे को लेने आई थी…
या इस बार वह आरव को अपने साथ ले जाएगी? 😶🌫️
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