episode 4

धुएँ में उभरी माया की आकृति धीरे-धीरे साफ होने लगी। उसकी आँखों में इस बार गुस्सा नहीं… दर्द था।

उसने अपने जले हुए बेटे की तरफ हाथ बढ़ाया—

“अब बहुत हो गया… चलो मेरे साथ।”

जला हुआ बच्चा पहले मुस्कुराया… फिर अचानक उसका चेहरा बदल गया। उसकी आँखें काली पड़ गईं।

“नहीं…” उसने धीमी आवाज़ में कहा,

“अब मैं अकेला नहीं हूँ… मुझे जाने नहीं देंगे।”

अचानक नीचे का अँधेरा गड्ढा और गहरा हो गया। उसमें से सैकड़ों परछाइयाँ बाहर निकलने लगीं—वो सभी आत्माएँ जो सालों से इस जगह में फँसी थीं।

एक साथ कई आवाज़ें गूँजीं—

“अगर यह गया… तो दरवाज़ा बंद हो जाएगा… और हम हमेशा के लिए कैद हो जाएँगे…”

आरव बीच में खड़ा काँप रहा था।

माया समझ गई—यह सिर्फ उसके बेटे का मामला नहीं था, यह उस पूरे श्राप का जाल था।

उसने धीरे से आरव की तरफ देखा और बोली—

“तुमने उसका दर्द अपने अंदर ले लिया… इसलिए तुम दरवाज़ा बन गए हो।”

आरव की माँ रोते हुए बोलीं—

“कोई रास्ता तो होगा… प्लीज़!”

कुछ पल की खामोशी के बाद माया ने फैसला लिया।

“एक रास्ता है…

लेकिन उसमें किसी एक को हमेशा के लिए यहाँ रहना होगा।”

कमरा सन्नाटा हो गया।

माया अपने बेटे के पास गई, उसके जले हुए चेहरे को छुआ—

“इस बार मैं तुम्हें नहीं खोऊँगी…”

फिर वह धीरे से मुड़ी… और आरव के सामने आकर खड़ी हो गई।

“तुम जाओगे।”

आरव की माँ चीख उठीं—

“नहीं! मेरा बच्चा—”

लेकिन माया की आवाज़ अचानक सख्त हो गई—

“या तो यह लड़का रहेगा…

या फिर यह दरवाज़ा हमेशा खुला रहेगा, और जो बाहर आएगा… वो पूरी दुनिया को अँधेरे में बदल देगा।”

आरव ने अपनी माँ का हाथ पकड़ा।

पहली बार उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आई—

“माँ… मैं डर नहीं रहा…”

धीरे-धीरे उसका हाथ राख में बदलने लगा।

माया ने अपना हाथ उसके सिर पर रखा, और फुसफुसाई—

“अब तुम इस जगह के रक्षक हो…”

अचानक एक तेज़ रोशनी फैली।

सारी परछाइयाँ चीखते हुए पीछे हट गईं। गड्ढा बंद होने लगा।

जब सब शांत हुआ—

ना लॉज था…

ना अँधेरा…

ना माया…

ना उसका बेटा…

सिर्फ खाली ज़मीन।

और आरव की माँ अकेली खड़ी थीं।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

कुछ महीनों बाद, उसी जगह एक छोटा सा मंदिर बना दिया गया।

लोग कहते हैं, वहाँ अब शांति है।

लेकिन जो भी रात में वहाँ जाता है, उसे एक हल्की सी आवाज़ सुनाई देती है—

“डरो मत… मैं यहीं हूँ…”

और कभी-कभी…

मिट्टी पर छोटे-छोटे जले हुए पैरों के निशान दिख जाते हैं।

मंदिर बनने के बाद कुछ समय तक सच में शांति रही। लोग दिन में आते, दीप जलाते, और कहते—“अब सब ठीक है।”

लेकिन रात… कभी पूरी तरह शांत नहीं हुई।

एक पुजारी को वहाँ सेवा के लिए रखा गया। पहली ही रात, ठीक 2:17 बजे, मंदिर की घंटी अपने-आप बजने लगी।

टुन… टुन… टुन...

पुजारी ने सोचा हवा होगी। पर जैसे ही उसने गर्भगृह की तरफ देखा—दीपक की लौ सीधी खड़ी थी… हवा बिल्कुल नहीं थी।

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