मंदिर बनने के बाद कुछ समय तक सच में शांति रही। लोग दिन में आते, दीप जलाते, और कहते—“अब सब ठीक है।”
लेकिन रात… कभी पूरी तरह शांत नहीं हुई।
एक पुजारी को वहाँ सेवा के लिए रखा गया। पहली ही रात, ठीक 2:17 बजे, मंदिर की घंटी अपने-आप बजने लगी।
टुन… टुन… टुन…
पुजारी ने सोचा हवा होगी। पर जैसे ही उसने गर्भगृह की तरफ देखा—दीपक की लौ सीधी खड़ी थी… हवा बिल्कुल नहीं थी।
और तब उसने देखा—मिट्टी पर छोटे-छोटे जले हुए पैरों के निशान…
जो सीधे मंदिर के अंदर जा रहे थे।
अगली सुबह, मंदिर की दीवार पर राख से लिखा मिला:
“मैंने उसे रोका… पर वो अब भी जागता है।”
गाँव वाले डर गए, पर किसी ने बात फैलने नहीं दी।
कुछ दिन बाद, एक और अजीब घटना हुई।
एक बच्चा मंदिर में खेलते-खेलते अचानक रुक गया। उसकी आँखें खाली हो गईं, और वह धीमी आवाज़ में बोला—
“दरवाज़ा हिल रहा है…”
फिर वह बेहोश हो गया।
रात को पुजारी ने हिम्मत करके वही जगह खोदनी शुरू की, जहाँ पहले गड्ढा खुला था।
कुछ ही गहराई पर उसे एक पत्थर की पटिया मिली।
उस पर उकेरा था:
“रक्षक कमजोर पड़े… तो रास्ता फिर खुल जाएगा।”
पुजारी के हाथ काँप गए।
उसने पटिया हटाई—
नीचे से ठंडी हवा का झोंका आया… और हल्की सी फुसफुसाहट:
“मुझे बाहर आने दो…”
अचानक पीछे से एक आवाज़ आई—
“नहीं।”
पुजारी ने मुड़कर देखा।
वहाँ कोई इंसान नहीं था…
पर एक हल्की सी आकृति थी—एक बच्चे की।
वही जले हुए पैरों के निशान… लेकिन इस बार डरावने नहीं, शांत।
आवाज़ आई—
“मैं अभी भी यहाँ हूँ… मैं उसे बाहर नहीं आने दूँगा…”
वह आरव था।
लेकिन उसकी आँखों में अब इंसानी गर्माहट नहीं थी—सिर्फ जिम्मेदारी।
पुजारी ने धीरे से पूछा—
“कब तक…?”
कुछ पल चुप्पी रही।
फिर जवाब आया—
“जब तक कोई और मेरी जगह लेने को तैयार न हो…”
अगले ही दिन, मंदिर के बाहर एक नई चेतावनी लिख दी गई:
“यहाँ रात में मत आना।”
लेकिन इंसान की फितरत है—जहाँ मना किया जाए, वहीं जाने का मन करता है।
एक रात, कुछ लड़के चैलेंज के तौर पर मंदिर में घुस गए।
उनमें से एक ने हँसते हुए कहा—
“देखते हैं, कौन रोकता है!”
जैसे ही वह उस जगह के पास पहुँचा—
ज़मीन हल्की सी हिली।
और उसके पैरों के नीचे…
एक पतली दरार खुल गई।
अंदर से वही आवाज़ आई—
“क्या तुम मेरी जगह लोगे…?”
बाकी लड़के भाग गए।
पर वह एक लड़का वहीं खड़ा रह गया…
जैसे किसी ने उसे पकड़ लिया हो।
सुबह, मंदिर फिर शांत था।
बस ज़मीन पर एक नई लिखावट थी—
“रक्षक बदल गया।”
अब सवाल ये है…
सुबह जब गाँव वाले मंदिर पहुँचे, हवा में कुछ अलग था—जैसे कोई भारी चीज़ हट गई हो… लेकिन पूरी तरह नहीं।
दीवार पर राख से लिखा था:
“मैं जा रहा हूँ… पर दरवाज़ा अब भी यहीं है।”
पुजारी समझ गया—रक्षक बदल चुका है।
उसने तुरंत ज़मीन की दरार वाली जगह देखी। अब वहाँ कोई गड्ढा नहीं था… बस एक हल्का सा काला निशान, जो धीरे-धीरे धड़क रहा था—जैसे ज़िंदा हो।
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