Chapter 4: अतीत की परछाइयाँ

रात गहरी हो चुकी थी…

चारों तरफ सन्नाटा था…

और उस सन्नाटे के बीच, सिकाजू अकेला चल रहा था।

ठंडी हवा उसके चेहरे को छू रही थी,

लेकिन उसके अंदर एक तूफान उठ चुका था…

यादों का तूफान… अतीत का तूफान…

“क्यों…?” उसने खुद से धीमे से पूछा,

“क्यों हर बार वही सब याद आ जाता है…?”

उसकी आँखें नम हो गईं।

उसे अपना बचपन याद आया…

वो छोटा सा, मासूम सिकाजू…

जो कभी बहुत खुश रहता था।

वो स्कूल जाता था,

दोस्तों के साथ खेलता था,

हँसता था… सपने देखता था।

लेकिन…

सब कुछ बदल गया…

जैसे ही वो क्लास में कदम रखता—

कुछ बच्चे हँसने लगते।

“अरे देखो… शराबी का बेटा आ गया!”

“इससे दूर रहो… ये भी अपने बाप जैसा बनेगा!”

उनकी बातें…

उनकी हँसी…

सिकाजू के दिल को चीर देती थीं।

वो चुप रहता…

कुछ नहीं बोलता…

बस सिर झुका कर बैठ जाता।

हर दिन…

उसकी आँखों में आंसू होते,

लेकिन वो किसी को दिखाता नहीं था।

“मैं इतना बुरा हूँ क्या…?”

उसने एक दिन खुद से पूछा था।

लेकिन…

घर भी उसके लिए कोई सुकून की जगह नहीं था।

दरवाजा खुलता…

और उसके पिता लड़खड़ाते हुए अंदर आते।

“खाना कहाँ है?!”

उनकी तेज आवाज पूरे घर में गूंजती।

माँ डर जाती…

जल्दी-जल्दी खाना लाती…

लेकिन फिर भी—

झगड़ा शुरू हो जाता।

“तुम कुछ काम नहीं करती!”

और फिर…

थप्पड़…

चिल्लाना…

रोना…

सिकाजू सब कुछ देखता रहता…

एक कोने में खड़ा…

डरा हुआ… टूटा हुआ…

“बस करो पापा… प्लीज…”

उसकी आवाज कभी-कभी निकलती,

लेकिन कोई सुनने वाला नहीं था।

धीरे-धीरे…

ये दर्द उसके अंदर भरता गया।

एक दिन…

वो स्कूल नहीं गया।

ना इसलिए कि उसे पढ़ना नहीं था…

बल्कि इसलिए कि जिंदगी ने उसे मजबूर कर दिया था।

गरीबी बढ़ती गई…

माँ ने फैक्ट्री में काम शुरू कर दिया।

और छोटा सा सिकाजू…

जिस उम्र में बच्चों को खेलना चाहिए,

वो एक छोटे होटल में काम करने लगा।

“ओए जल्दी काम कर!”

मालिक चिल्लाता।

“इतना भी नहीं आता तुझे?”

ग्राहक हँसते।

उसे कम पैसे मिलते…

और इज्जत तो जैसे कभी मिली ही नहीं।

दिन बीतते गए…

और उसका बचपन… धीरे-धीरे खत्म हो गया।

फिर एक दिन…

उम्मीद लेकर उसका परिवार जम्मू चला गया।

“शायद यहाँ सब ठीक हो जाए…”

सिकाजू ने सोचा।

उसकी आँखों में फिर से सपने आ गए।

“मैं फिर से पढ़ूंगा…”

उसने खुद से कहा।

लेकिन…

किस्मत को शायद ये मंजूर नहीं था।

उसके पिता और भाई…

वही रहे…

शराब… झगड़ा… बर्बादी…

“अब पढ़ाई का सपना भूल जा!”

एक दिन उसके भाई ने गुस्से में कहा।

और उस दिन…

सिकाजू का सपना फिर से टूट गया।

वो चुप था…

लेकिन अंदर से पूरी तरह बिखर चुका था।

वर्तमान में लौटते हुए…

उसकी आँखों से आंसू बहने लगे।

आज… पहली बार…

उसे एक बात समझ आई—

वही शराब…

जिसने उसका बचपन छीना…

आज…

उसका वर्तमान भी खत्म कर रही है।

उसने अपनी मुट्ठी कस ली।

“बस… अब और नहीं…”

उसकी आवाज में गुस्सा था… दर्द था… लेकिन हिम्मत भी थी।

“चाहे कुछ भी हो जाए…

मैं इस गंदे काम को कभी हाथ नहीं लगाऊँगा।”

उसकी आँखों में अब आंसू नहीं…

आग थी।

“मैं अपनी जिंदगी बदलूँगा…

अपने घर में फिर से खुशियाँ लाऊँगा…”

रात और गहरी हो गई…

लेकिन इस बार…

सिकाजू के अंदर एक नई सुबह जन्म ले चुकी थी।

☝️

लेकिन…

जिस रास्ते को उसने चुना था…

वो आसान नहीं था…

और उसे नहीं पता था कि—

अगले ही दिन…

उसकी जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आने वाला था,

जो उसे या तो बना देगा…

या पूरी तरह तोड़ देगा… 😶

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