अंधेरा… और गहरा हो चुका था।
हवेली के उस बंद कमरे में हवा जैसे जम सी गई थी।
“पहली रात शुरू हो चुकी है…”
डायरी में लिखा हुआ यह वाक्य जैसे पूरे कमरे में गूंज रहा था।
आराध्या की सांसें तेज़ थीं और दिल इतनी जोर से धड़क रहा था कि उसे खुद अपनी धड़कनें सुनाई दे रही थीं।
रोहन का चेहरा डर से पीला पड़ चुका था।
उसके हाथ काँप रहे थे।
“आराध्या… हमें यहाँ से तुरंत निकलना चाहिए… ये जगह ठीक नहीं है।”
लेकिन जैसे ही वह पीछे मुड़ा—
धड़ाम!!!
एक तेज़ आवाज़ के साथ हवेली का मुख्य दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।
पूरे कमरे में धूल उड़ गई।
और उसी के साथ हवा और भारी हो गई।
अब चारों तरफ सिर्फ अंधेरा था।
तभी…
धम… धम… धम…
ऊपर की मंज़िल से फिर वही कदमों की आवाज़ आने लगी।
लेकिन इस बार आवाज़ अलग थी।
पहले से ज्यादा भारी…
पहले से ज्यादा करीब…
ऐसा लग रहा था जैसे कोई धीरे-धीरे जानबूझकर उनकी तरफ बढ़ रहा हो।
आराध्या ने ऊपर देखा।
लेकिन वहाँ कोई नहीं था।
सिर्फ दीवार पर एक परछाईं धीरे-धीरे हिल रही थी।
पर अजीब बात ये थी कि वहाँ कोई इंसान मौजूद नहीं था।
रोहन की आवाज़ काँप उठी।
“ये… ये दीवार पर क्या चल रहा है?”
तभी अचानक—
आराध्या के हाथ से डायरी अपने आप फिसलकर ज़मीन पर गिर गई।
फड़… फड़… फड़…
उसके पन्ने खुद-ब-खुद पलटने लगे।
जैसे कोई अदृश्य ताकत उसे खोल रही हो।
और फिर…
पन्ने अचानक रुक गए।
नया संदेश लिखा था:
“तुम अंदर आ चुके हो…”
आराध्या की आँखें फैल गईं।
“ये डायरी हमें क्यों चुन रही है?” उसने फुसफुसाकर कहा।
लेकिन जवाब कहीं नहीं था।
कमरे में अचानक ठंडी हवा चलने लगी।
ऐसी ठंड… जो हड्डियों तक महसूस हो रही थी।
और उसी हवा में किसी की हल्की फुसफुसाहट सुनाई दी—
“अब लौटना मुमकिन नहीं…”
रोहन पीछे हट गया।
“ये आवाज़… कहाँ से आ रही है?”
लेकिन कमरे में कोई नहीं था।
सिर्फ अंधेरा था… और डर।
तभी दीवारें हल्की-हल्की कांपने लगीं।
पुरानी पत्थर की दरारों से लाल रोशनी निकलने लगी।
जैसे कोई चीज़ अंदर से सांस ले रही हो।
रोहन घबराकर बोला—
“आराध्या… ये हवेली हमें निगल रही है…”
और उसी पल—
दीवार के बीचों-बीच एक नया दरवाज़ा बन गया।
जो पहले वहाँ था ही नहीं।
उस पर लिखा था:
“यहाँ सच दफन नहीं… जिंदा है…”
आराध्या कुछ पल उसे देखती रही।
उसके अंदर डर भी था… और curiosity भी।
तभी—
ठक… ठक…
दरवाज़े के अंदर से किसी ने हल्के से खटखटाया।
रोहन चिल्लाया—
“मत खोलो!!!”
लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।
दरवाज़ा खुद-ब-खुद थोड़ा खुल गया।
और अंदर से सिर्फ अंधेरा दिखा…
गहरा… बिना अंत वाला अंधेरा।
और फिर उसी अंधेरे से…
एक बहुत धीमी आवाज़ आई—
“आराध्या…”
उसका नाम फिर से बुलाया गया था।
लेकिन इस बार आवाज़ हवेली के बाहर से नहीं…
अंदर से थी।
रोहन ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“अगर हम अंदर गए… तो वापस नहीं आएंगे…”
आराध्या कांप रही थी।
लेकिन उसकी आँखों में डर के साथ एक सवाल भी था।
और फिर…
उसने एक कदम आगे बढ़ा दिया।
जैसे ही वह दरवाज़े के पास पहुँची…
पूरा कमरा जोर से हिल गया।
धड़ाम!!!
एक तेज़ सफेद चमक हुई…
और दोनों अंदर खिंच गए।
दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।
अब हवेली फिर से शांत थी…
लेकिन इस बार शांति अलग थी।
क्योंकि अंदर से अब भी…
धीमे-धीमे कदमों की आवाज़ आ रही थी।
कदम… कदम… कदम…
जैसे कोई उनका इंतज़ार कर रहा हो।
और फिर एक फुसफुसाहट गूंजी—
“अब खेल शुरू हुआ है…”
🔥 क्रमशः…
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