आधी रात की परछाईं

"कुछ साये सिर्फ दिखाई नहीं देते... वे तुम्हें चुनते हैं।"

हवेली के उस गुप्त कमरे में अजीब-सा सन्नाटा पसरा हुआ था।

ऐसा सन्नाटा... जो कानों में शोर बनकर गूंजने लगता है।

आराध्या और रोहन बिल्कुल स्थिर खड़े थे।

दोनों की सांसें तेज़ चल रही थीं।

हवा में नमी और पुराने कागजों की गंध घुली हुई थी।

रोहन ने टॉर्च को थोड़ा ऊपर उठाया।

उसकी रोशनी धूल से भरी दीवारों पर पड़ी।

कमरे की हर चीज़ वर्षों से बंद लग रही थी।

लेकिन...

अभी कुछ देर पहले जो आवाज़ उन्होंने सुनी थी...

वो किसी पुराने सामान की नहीं थी।

वो किसी की मौजूदगी का एहसास था।

"रोहन..." आराध्या ने धीमी आवाज़ में कहा, "मुझे अच्छा नहीं लग रहा... हमें यहाँ से चलना चाहिए।"

रोहन ने उसकी तरफ देखा।

उसके चेहरे पर भी डर साफ दिखाई दे रहा था।

लेकिन अब वापस लौटना आसान नहीं था।

क्योंकि जिस डायरी ने उन्हें यहाँ तक पहुंचाया था...

उसके हर पन्ने में इसी कमरे का जिक्र था।

और शायद...

इसी कमरे में उन सभी सवालों के जवाब छिपे थे।

अचानक...

ठक...

ठक...

ठक...

कदमों की आवाज़ सुनाई दी।

दोनों एकदम चुप हो गए।

आवाज़ कमरे के दूसरे कोने से आ रही थी।

लेकिन वहाँ कोई नहीं था।

रोहन ने टॉर्च उस दिशा में घुमाई।

कुछ सेकंड तक कुछ दिखाई नहीं दिया।

फिर...

अंधेरे के बीच एक धुंधली आकृति उभरने लगी।

धीरे-धीरे...

जैसे कोई परछाईं आकार ले रही हो।

आराध्या की सांस अटक गई।

उसका गला सूखने लगा।

अब वो आकृति साफ दिखाई दे रही थी।

सफेद कपड़े...

झुका हुआ शरीर...

और दो चमकती हुई आँखें।

वो उन्हें देख रही थी।

बिना पलक झपकाए।

बिना हिले।

बिना कुछ कहे।

"रोहन..." आराध्या की आवाज़ कांप रही थी, "वो... इंसान नहीं है।"

रोहन ने खुद को संभालने की कोशिश की।

उसने टॉर्च की रोशनी सीधे उस आकृति पर डाली।

और अगले ही पल...

वो गायब हो गई।

जैसे कभी थी ही नहीं।

दोनों के चेहरे का रंग उड़ गया।

"नहीं..." रोहन बुदबुदाया।

"मैंने भी देखा था..." आराध्या लगभग रोने लगी थी।

तभी...

धड़ाम!

कमरे का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

इतनी ज़ोर से कि पूरा कमरा हिल गया।

आराध्या चीख पड़ी।

रोहन भागकर दरवाज़े तक पहुँचा।

उसने हैंडल घुमाया।

लेकिन दरवाज़ा नहीं खुला।

"खुलो!"

"खुलो!"

उसने पूरी ताकत लगा दी।

लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।

और तभी...

कमरे का तापमान अचानक गिरने लगा।

ठंडी हवा उनके शरीर से टकराई।

ऐसा लगा जैसे किसी बर्फीली जगह पर खड़े हों।

फिर...

एक फुसफुसाहट सुनाई दी।

बहुत धीमी।

बहुत करीब से।

"आराध्या..."

आराध्या जम गई।

उसने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।

कोई नहीं था।

लेकिन आवाज़ बिल्कुल उसके कान के पास से आई थी।

"क... कौन है?" उसकी आवाज़ टूट रही थी।

कुछ पल तक कोई जवाब नहीं मिला।

फिर दीवार पर हल्की रोशनी चमकने लगी।

जैसे किसी ने अंधेरे में मोमबत्ती जला दी हो।

रोशनी धीरे-धीरे फैलने लगी।

और फिर...

दीवार पर शब्द उभरने लगे।

खून जैसे लाल अक्षर।

"जो हवेली में कदम रखता है...

वह अकेला नहीं आता।"

आराध्या की आँखें फैल गईं।

"इसका क्या मतलब है?"

रोहन जवाब नहीं दे पाया।

क्योंकि उसी समय...

कमरे के कोने से फिर कदमों की आवाज़ आने लगी।

ठक...

ठक...

ठक...

इस बार आवाज़ और करीब थी।

दोनों ने एक साथ पीछे देखा।

और उनके शरीर में सिहरन दौड़ गई।

वो साया फिर वहाँ खड़ा था।

लेकिन इस बार पहले से ज्यादा करीब।

उसका चेहरा अब साफ दिखाई दे रहा था।

और उसके होंठों पर एक अजीब मुस्कान थी।

धीरे-धीरे...

उसने अपना सिर ऊपर उठाया।

और फुसफुसाया—

"तुम दोनों...

मुझे छोड़कर कैसे जाओगे?"

आराध्या के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

रोहन ने हिम्मत जुटाकर पूछा—

"तुम कौन हो?"

कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा।

फिर...

वो साया मुस्कुराया।

और अचानक कमरे की सारी रोशनी बुझ गई।

पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।

आराध्या चीख उठी।

रोहन ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

दोनों को सिर्फ अपनी धड़कनों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।

फिर...

एक तेज़ चमक हुई।

और रोशनी वापस आ गई।

लेकिन साया गायब था।

कमरा फिर खाली था।

ऐसा लग रहा था जैसे कुछ हुआ ही नहीं।

लेकिन तभी...

आराध्या की नजर दीवार पर गई।

और उसकी चीख निकल गई।

दीवार पर खून जैसे अक्षरों में लिखा था—

"अगला नंबर तुम्हारा नहीं...

तुम्हारे अतीत का है।"

आराध्या का दिल तेजी से धड़कने लगा।

"मेरे अतीत का?"

"लेकिन क्यों?"

"मैं इस हवेली को जानती तक नहीं..."

तभी उसे महसूस हुआ कि रोहन बिल्कुल चुप खड़ा है।

उसने उसकी तरफ देखा।

रोहन के हाथ में एक पुराना कागज़ था।

पीला पड़ चुका।

मुड़ा हुआ।

और सबसे अजीब बात...

वो कागज़ अभी कुछ सेकंड पहले वहाँ था ही नहीं।

"ये तुम्हें कहाँ मिला?" आराध्या ने पूछा।

रोहन ने कोई जवाब नहीं दिया।

उसकी आँखें उस कागज़ पर जमी हुई थीं।

कांपते हाथों से उसने कागज़ आराध्या की तरफ बढ़ाया।

आराध्या ने उसे खोला।

और अगले ही पल...

उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

वो एक पुरानी तस्वीर थी।

तस्वीर में एक लड़की खड़ी थी।

वो लड़की...

आराध्या थी।

बिल्कुल उसी जैसी।

वही चेहरा।

वही आँखें।

लेकिन तस्वीर कम से कम बीस साल पुरानी लग रही थी।

और उसके बगल में एक लड़का खड़ा था।

जिसे देखकर रोहन का चेहरा सफेद पड़ गया।

क्योंकि वो लड़का...

बिल्कुल रोहन जैसा दिख रहा था।

लेकिन उसकी आँखें...

इंसानों जैसी नहीं थीं।

उनमें अजीब-सी चमक थी।

ऐसी चमक...

जो किसी जीवित इंसान की नहीं हो सकती।

तभी...

कमरे के पीछे से एक भारी आवाज़ गूंजी—

"अब तुम्हें सच पता चल ही जाएगा..."

और उसी पल...

कमरे की दीवार में एक नया दरवाज़ा उभरने लगा।

एक ऐसा दरवाज़ा...

जो कुछ सेकंड पहले वहाँ था ही नहीं।

आराध्या और रोहन डर से उसे देखते रह गए।

क्योंकि शायद...

उस दरवाज़े के पीछे छिपा था हवेली का सबसे बड़ा रहस्य...

और उनके अतीत का सबसे भयानक सच।

🔥 To Be Continued...

━━━━━━━━━━━━

❓ क्या रोहन वही है, जो वह खुद को बताता है... या उसकी असली पहचान कुछ और है?

❓ आखिर उस पुरानी तस्वीर में आराध्या और रोहन जैसे दिखने वाले लोग कौन थे?

❓ और दीवार के पीछे उभरे उस रहस्यमयी दरवाज़े के पीछे ऐसा क्या छिपा है, जिसे हवेली सालों से बचाकर रखे हुए है?

━━━━━━━━━━━━━━━

🔥 अगले अध्याय में...

एक ऐसा सच सामने आएगा, जो आराध्या की पूरी दुनिया बदल देगा...

और शायद...

आपकी भी।

📖 पढ़ते रहिए — हवेली के अंधेरे राज़...

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📖 कहानी को आगे पढ़ते रहिए… सच अभी बाकी है…

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